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Thursday, 28 December 2017

Sarnath दलाई लामा के स्वागत को तैयार , लाइब्रेरी को देंगे 300 पांडुलिपियां

सारनाथ (वाराणसी)। आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा के स्वागत के लिए Sarnath का तिब्बती उच्च शिक्षण संस्थान सजधज कर तैयार है। आयोजन समिति से जुड़े लोगों ने बुधवार को Sarnath में आयोजन स्थल का निरीक्षण किया।

दलाई लामा के आगमन के मद्देनजर केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षण संस्थान के चप्पे-चप्पे को सजाया गया है। संस्थान के स्वर्ण जयंती वर्ष पर दलाई लामा की उपस्थिति में विविध कार्यक्रम होने हैं। प्रमुख रूप से इसके तहत संस्थान की सेंट्रल लाइब्रेरी के विस्तारीकरण का लोकार्पण होगा।

इस लाइब्रेरी में नालंदा विश्वविद्यालय के भयानक अग्निकांड से बचाकर दुनिया के अन्य देशों में ले जाई गई पांडुलिपियों के तिब्बती भाषा में अनुवाद रखे हुए हैं।

उल्लेखनीय है कि चीन के दबाव में तिब्बत छोड़ते वक्त तत्कालीन दलाई लामा ने इन पांडुलिपियों को सारनाथ में लाकर सुरक्षित रखा था। इन दिनों दुनिया के 50 से अधिक देशों में तिब्बती भाषा की पांडुलिपियों का संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी सहित तीन दर्जन से अधिक भाषाओं में अनुवाद का क्रम जारी है।

दूसरा महत्वपूर्ण आयोजन मन की एकाग्रता पर विशेष सम्मेलन है। इस सम्मेलन में 70 देशों के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। जिस सभागार में यह सम्मेलन होना है, उसका भी सुंदरीकरण किया गया है।

इस सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इस समारोह में तिब्बत की निर्वासित सरकार के राष्ट्राध्यक्ष के भी भाग लेने की संभावना है। फिलहाल उनके आगमन की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के सेंट्रल लाइब्रेरी Sarnath का उद्घाटन 1 जनवरी को दलाई लामा करेंगे। केंद्रीय पुस्तकालय का जीर्णोद्धार व दीवारों पर नक्काशी तिब्बती स्थापत्य कला में की जा रही है। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान में आयोजित होने वाले सेमिनार में दलाई लामा शामिल होंगे। उन्हें नकारात्मक शक्तियों से बचाने के लिए पूरे पंडाल को तिब्बती मंत्रों से अभी मंत्रित किया गया है।

सहायक प्रोफेसर नवांग तेन्फेल ने बताया कि पंडाल में जहां दलाई लामा बैठेंगे, उसके ठीक पीछे भगवान बुद्ध की तस्वीर लगी होगी। बुद्ध की तस्वीर के दाहिने नागार्जुन व बायें बौद्ध विद्वान आसंग की तस्वीर लगाई गई है। लुंगता पर अवलेकेश्वर, मंजुश्री, वज्रयानी व भगवान बुद्ध के मंत्र लिखे होंगे, जिन्हें पंडाल में जगह-जगह टांगा गया है।
इसके साथ ही पंडाल में प्राचीन नालंदा के 17 बौद्ध विद्वानों की तस्वीर लगाई गई है। उसके बाद शंख, चक्र सहित आठ शुभ चिन्ह की तस्वीर लगाई गई हैं। पूरे परिसर में दलाई लामा के गुजरने वाले रास्तों पर आठ तिब्बती शुभ चिन्ह बनाया गया है, जो दलाई लामा को नकारात्मक शक्तियों से बचाएगा।

आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने 1967 में तिब्बती भाषा में लिखी बुद्ध वचन से सम्बंधित लगभग 300 पांडुलिपियों को केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान को दान में दी थी। इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसर जाम्पा सामतेंन ने बताया कि बुद्ध वचन से सम्बंधित पाण्डुलिपि की छपाई 1730 में तिब्बती शहर डेरगे में हुआ था। शेष पांडुलिपियां सातवीं से 12वीं शताब्दी के बीच भारतीय विद्वानों द्वारा किये गए टिप्पणियों का तिब्बती भाषा में अनुवाद है। इसका प्रकाशन तिब्बत की राजधानी ल्हासा से हुआ था।

तिब्बती पांडुलिपियों की छपाई के लिए सबसे पहले विशेष प्रकार की हिमालयी घास के छाल से कागज तैयार किए जाते थे। तत्पश्चात मुलायम किस्म के तिब्बती पेड़ की लकड़ी के पट्टी पर हाथ से तिब्बती भाषा में बुद्ध वचन को उकेरा जाता था। इसके बाद वृक्षों की पत्तियों से तैयार रंग से स्याही बनाकर हिमालयी घास की छाल से तैयार कागज पर छपाई की जाती थी।
बहरहाल Sarnath का तिब्बती उच्च शिक्षण संस्थान सजधज कर तैयार है। -एजेंसी

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