मोदी सरकार की ओर से हाल में लाए गए FRDI यानी फाइनैंशल रेजॉलुशन ऐंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल में बेल-इन को लेकर बैंक डिपॉजिटर्स में जो डर का माहौल बना था वह एचएनआई में भी फैल गया है और ये रईस निवेशक सुरक्षित कानूनी विकल्प ढूंढने में जुट गए हैं। इस बारे में कुछ बड़े मनी मैनेजरों और वकीलों से बातचीत करने पर पता लगा कि उनसे बॉलिवुड सिलेब्रिटीज से लेकर कॉर्पोरेट सीईओज और एनआरआईज तक पूछे रहे हैं कि क्या उनको अपने फिक्स्ड डिपॉजिट बंद कर देने चाहिए?
बैंकों का कहना है कि पब्लिक में डर फैलाया जा रहा है लेकिन एफडी इंस्ट्रूमेंट्स से बड़े पैमाने पर निकासी नहीं हो रही है।
ऐसे ही मामले देख रहे एक वकील ने बातचीत में कहा, ‘यह जानने के लिए हमारे पास कई बॉलीवुड सिलेब्रिटीज से लेकर क्रिकेटर्स और हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (एचएनआईज) की तरफ से कॉल्स आई थीं कि बैंकों के मामले में बेल-इन क्लॉज कहां लागू हो सकता है और इसका क्या असर हो सकता है? लोगों के दिमाग में यह बात बैठ गई है कि बैंकों के बेल-इन में छोटे डिपॉजिटर्स को तो छोड़ दिया जाएगा लेकिन हाई वैल्यू डिपॉजिट्स का इस्तेमाल किया जा सकता है।’
पिछले महीने बैंक डिपॉजिट्स की सेफ्टी को लेकर पब्लिक में बड़ा हंगामा मचा था। उनकी चर्चा में एक बात यह उठी कि बैंकों के बेल-इन में डिपॉजिटर्स का पैसा यूज हो सकता है। इससे डिपॉजिटर्स के दिलों में बड़ा डर बैठ गया। FRDI को लेकर पब्लिक में इतनी गलतफहमी पैदा हुई कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली तक को इस मामले में बोलना पड़ गया। उन्होंने कहा कि सरकार डिपॉजिटर्स के पैसों को पूरी तरह से सुरक्षित रखने को लेकर प्रतिबद्ध है।
एक पीएसयू बैंकर ने पहचान जाहिर नहीं किए जाने की शर्त पर कहा, ‘डर की बड़ी वजह सोशल मीडिया में फैल रही अफवाह है, लेकिन हमारे यहां से डिपॉजिट निकल नहीं रहा है। 10 बैंकों को प्रॉम्प्ट करेक्टिव ऐक्शन के दायरे में लाया गया है, ऐसे में जिन लोगों को मामले की पूरी जानकारी नहीं थी, उन्होंने यह अफवाह फैला दी कि ये बैंक बंद कर दिए जाएंगे। ऐसे में बैंक डिपॉजिटर्स का डरना स्वाभाविक ही था लेकिन इतिहास गवाह है कि आरबीआई और सरकार दोनों ने कभी किसी बैंक को बर्बाद होने नहीं दिया।’
FRDI बिल का मकसद वित्तीय संस्थानों को बंद करने की व्यवस्थित प्रक्रिया स्थापित करना है। इसमें रेजॉलुशन कॉर्पोरेशन (RC) बनाने का प्रस्ताव है जो बैंक, NBFC, इंश्योरेंस कंपनियों, स्टॉक एक्सचेंजों सहित फाइनैंशल इंस्टीट्यूशंस में वित्तीय दिक्कतों के शुरुआती संकेतों को पकड़ सकेगा। इसमें इस बात का भी जिक्र है कि फाइनैंशल टर्म्स में हमेशा जीरो लॉस की स्थिति बनना मुमकिन नहीं लेकिन सरकार और रेग्युलेटर को यह सुनिश्चित करना होगा कि फाइनैंशल इंस्टीट्यूशंस के दिवालिया होने पर नुकसान को सीमित रखा जा सकेगा और उनको टैक्सपेयर्स के पैसे से बेलआउट नहीं किया जाएगा।
-एजेंसी
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