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Thursday, 31 May 2018

तंबाकू दिवस: भारत में करीब 12 करोड़ लोग करते हैं धूम्रपान…


नई दिल्ली। आज वर्ल्ड नो टोबैको डे यानी विश्व तंबाकू निषेध दिवस है। तंबाकू सेवन किस कदर घातक हो सकता है इसका अंदाजा वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की उस रिपोर्ट से लगाया जा सकता है जिसमें बताया गया है कि पिछली यानी 20वीं सदी में तंबाकू सेवन से मरने वालों की संख्या 10 करोड़ से ज्यादा थी। भारत भी इसके असर से अछूता नहीं है। देश में हर साल 10 लाख लोगों की मौत तंबाकू का सेवन करने से होती है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगर हालात नहीं बदले तो 21वीं सदी में इससे मरने वालों का आंकड़ा 1 अरब के करीब पहुंच सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, दुनिया की करीब 7 अरब आबादी में 1 अरब लोग सिगरेट के जरिए तंबाकू का सेवन करते हैं। यानी हर 7 में से 1 शख्स इस खतरनाक आदत का शिकार है। दुनियाभर के 12 प्रतिशत (करीब 12 करोड़) स्मोकर्स भारत में हैं।

चीन में हैं दुनिया के सबसे ज्यादा स्मोकर्स/ इंडोनेशिया में 76% पुरुष करते हैं धूम्रपान
दुनिया में धूम्रपान करने वालों की सबसे ज्यादा संख्या चीन में है। चीन की 1.3 अरब की आबादी में करीब 31 करोड़ 50 लाख लोग आदतन सिगरेट पीते हैं। दुनियाभर में बनने वाली एक तिहाई सिगरेट की खपत भी चीन में ही होती है।

इंडोनेशिया की आबादी में 15 साल के ऊपर के 76 फीसदी पुरुष स्मोकिंग करते हैं। ये जनसंख्या के अनुपात के लिहाज से सबसे ज्यादा है। दुनियाभर में स्मोकर्स की 80 फीसदी आबादी निचले और मध्यम वर्गीय देशों में रहती है। स्मोकिंग करने वाले 22 करोड़ लोग गरीब हैं।

भारत में हर साल करीब 10 लाख लोगों की मौत तंबाकू सेवन के कारण होती है। देश में 16 की उम्र से कम 24 फीसदी बच्चे किसी ना किसी पड़ाव पर तंबाकू का सेवन कर चुके हैं, जबकि 14 प्रतिशत अब भी तंबाकू उत्पादों का प्रयोग कर रहे हैं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य के 2016 सर्वे के मुताबिक भारत के 44.4% पुरुष किसी ना किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं। वहीं करीब 6.8% महिलाएं भी हर दिन तंबाकू का इस्तेमाल करती हैं।

लांसेट मेडिकल जर्नल की अप्रैल 2017 की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बीते 25 वर्षों में रोजाना तंबाकू का सेवन करने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है। 1990 में जहां 3 में से 1 पुरुष और 12 में से 1 महिला रोजाना धू्म्रपान करती थी वहीं 2015 में 4 में से 1 पुरुष और 20 में से 1 महिला ही रोज धूम्रपान करती थी।

तंबाकू उत्पादों के कम दाम सीधे तौर पर देश में बढ़े हुए तंबाकू सेवन के लिए जिम्मेदार हैं। अलग-अलग देशों के कमजोर नियम भी इसके पीछे जिम्मेदार हैं। हालिया समय में पाकिस्तान में सिगरेट पैकेट में छपने वाली चेतावनी को लेकर नियम कमजोर किए गए हैं। अफ्रीकी देशों में धूम्रपान करने वालों की संख्या बढ़ने के पीछे भी यही वजह है।

ऑस्ट्रेलिया ब्राजील ब्रिटेन जैसे देशों में बढ़ी कीमतें स्वास्थ्य चेतावनी और प्रतिबंधों के चलते लोगों के बीच तंबाकू इस्तेमाल में कमी आई है। इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट का बाजार में आना भी इसकी एक वजह है। फ्रांस में 2016 के मुकाबले 2017 में स्मोकर्स की संख्या में करीब 10 लाख लोगों की कमी आई है।

चीन में 2012 में तंबाकू सेवन करने वाली जनसंख्या सबसे ज्यादा थी। पिछले 6 साल में इसमें करीब 10 फीसदी की गिरावट आई है।
तंबाकू विश्व में सबसे ज्यादा मौतों के कारणों में से एक है। हर साल सिगरेट पीने और उसके धुएं से मरने वालों की संख्या 70 लाख से ज्यादा है। तंबाकू सेवन से हर 6 सेकेंड में एक व्यक्ति की मौत हो जाती है। कैंसर हार्ट अटैक, स्ट्रोक और फेफड़े की बीमारियां तंबाकू से जुड़ी कुछ बेहद गंभीर परेशानियां हैं। हर साल करोड़ो लोग इन बीमारियों की चपेट में आकर जान गंवा देते हैं।

20वीं सदी में तंबाकू सेवन की वजह से करीब 10 करोड़ लोगों की जानें गईं। ये विश्व युद्ध-1 (करीब 1.8 करोड़ मौतें) और विश्व युद्ध-2 (करीब 8 करोड़ मौतें) में हुई मौतों से भी ज्यादा है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, अगर इसी तरह तंबाकू की खपत जारी रही तो 21वीं सदी में इसके असर से मरने वालों की संख्या 1 अरब के पार जा सकती है।

साइंटिफिक जर्नल टोबैको कंट्रोल की रिपोर्ट में कहा गया है कि हर साल दुनियाभर में होने वाले चिकित्सीय खर्च का करीब 6 फीसदी धूम्रपान के इलाज में खर्च होता है। ये दुनियाभर की जीडीपी का 2 फीसदी है। दुनियाभर में तंबाकू पैदा करने के लिए करीब 43 लाख हेक्टेयर (1 करोड़ एकड़) जमीन इस्तेमाल हो रही है। ये स्विट्जरलैंड के क्षेत्रफल के बराबर है।

टोबैको एटलस वेबसाइट की रिपोर्ट में दावा है कि हर साल दुनिया में करीब 46 लाख करोड़ रुपए की सिगरेट बिक्री होती है। स्मोकर्स हर साल 5.7 ट्रिलियन सिगरेट पी जाते हैं। यानी हर मिनट करीब 1 करोड़ 10 लाख सिगरेट की खपत होती है। दुनिया की पांच बड़ी कंपनियां 80 फीसदी सिगरेट बाजार को नियंत्रित करती हैं। 2015 में टॉप-6 कंपनियों ने 4 लाख करोड़ का लाभ अर्जित किया था।

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