आगामी लोकसभा चुनाव का तानाबाना बुना जाने लगा है। कही गठबंधन की तैयारी है तो कही उपलब्धियों का बखान चल रहा है। लेकिन 2019 की लोकसभा पठकथा इस बार किसान और बेरोजगार लिखेगें। जिस किसान को हम भगवान मानते है वह किसान बेमौत मर रहा है। किसानी घाटे का सौदा बन चुकी है। उस पर तुर्रा यह कि सन् 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर दी जाएगी। अब किसान के पास इंतजार का समय नही है। वह सडक पर उतर चुका है। दूसरा बड़ा फेक्टर 2019 के चुनाव में बेरोजगारी होगा। जिस युवा शक्ति के दम पर हम विश्व भर में इतराते फिरते हैं। देश की वही युवा शक्ति एक अदद नौकरी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। वर्ष 2018 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.86 करोड़ रहने का अनुमान है। इसलिए दावा कोई कुछ भी करे। 2019 के चुनाव दावों को दरकिनार कर किसान और बेरोजगारों की मंशा के अनुरूप परिणाम देने वाला होगा।
देश के किसानों ने एक बार फिर सड़कों पर उतरकर बड़ा संदेश दिया है, जिसका असर शायद आने वाले दिनों में बाजार की बढ़ी हुई गरमी के रूप में महसूस हो। दस दिन के ‘गांव बंद’ की शुरुआत कर हरियाणा, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल के ये किसान अपनी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ ही सब्जियों का भी न्यूनतम मूल्य तय करने और पूरे देश के किसानों के लिए कर्ज माफी मांग रहे हैं। आंदोलन के पहले ही दिन पश्चिमी यूपी सहित कई राज्यों में फल, सब्जी और दूध विरोध स्वरूप सड़कों पर फेंके जाने की खबर है। मंदसौर में पुलिस की गोली से छह किसानों के मारे जाने की पहली बरसी छह जून के करीब आने के कारण मध्य प्रदेश में खास एहतियात बरती जा रही है। सवाल है कि किसान बार-बार खेत छोड़कर सड़कों पर क्यों आ रहे हैं? सीधा मतलब है कि उनकी समस्याओं के समाधान के प्रति उन्हें आश्वस्त नहीं किया जा सका है। किसान लगातार संकट में घिरता गया है और संसाधनों की महंगाई के दौर में खेती-किसानी पहले जैसी आसान नहीं रह गई है। किसानों की स्थिति सुधारने की लिए 2004 में केंद्र सरकार ने जाने-माने अर्थशास्त्री एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स बनाया था। आयोग ने 2006 में किसानों के समग्र और तार्किक विकास के लिए कुछ सुझाव भी दिए। रिपोर्ट सत्ता के किस गलियारे में खो गई, कोई नहीं जानता। किसान बस यही रिपोर्ट लागू करने, कर्ज माफी और अपनी फसल का उचित समर्थन मूल्य मांगते रहे हैं। इस बार भी मुद्दा यही है। ज्यादा दिन नहीं बीते, जब फरवरी में देश भर के किसानों के 68 संगठनों ने दिल्ली कूच किया था। तब भले ही सीमाएं बांधकर इन्हें वहां पहुंचने से रोक दिया गया हो, लेकिन किसान संगठनों ने उसी वक्त इसे प्रतीकात्मक प्रयास बताकर जता दिया था कि उनकी असली योजना तो अपने-अपने राज्य में आंदोलन को ऐसी गति देने की है, जिसकी आवाज दूर तक सुनाई दे। आज जब किसान अपने हल-बैल-ट्रैक्टर छोड़ सड़कों पर हैं, तो समझा जाना चाहिए कि उस योजना को अमली जामा देने की शुरुआत हो चुकी है। किसान संगठन आसपास के शहरों में अपनी सब्जियों और दुग्ध उत्पादों की आपूर्ति दस दिन तक निलंबित रखेंगे और राजमार्गों पर शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन करेंगे। .सच तो यही है कि किसान लंबे समय से तमाम संकटों से जूझता रहा है, लेकिन उसकी मुश्किलों के स्थाई समाधान के लिए कभी कुछ नहीं हुआ। उचित दाम का मामला और बिचैलियों का जाल तो देशव्यापी समस्या है। ऐसे में उसे स्वामीनाथन आयोग की व्यावहारिक सिफारिशें देने में कोताही समझ से परे है। यह रिपोर्ट उन्हें लागत का पचास प्रतिशत से ज्यादा दाम और उन्नत किस्म के बीज कम दामों में देने की बात करने के साथ उनके लिए विलेज नॉलेज सेंटर बनाने, महिला किसानों के अलग क्रेडिट कार्ड, प्राकृतिक आपदा से बचाने के लिए जोखिम फंड जैसी व्यावहारिक बातें ही तो करती है। इस वक्त किसान मुश्किलों के उस दोराहे पर है, जहां जरूरत उनकी बातें सुनने, उन्हें व्यावहारिक समाधान देने की है। उन्हें यह महसूस कराने की जरूरत है कि कोई है, जो उनकी मांगों को महज मांग नहीं, उनकी जरूरत समझता है। अब बाॅत करे बेरोजगारी पर तो इसकी कड़वी सच्चाई यह है कि प्रतिदिन बढ़ती बेरोजगारी के कारण सबसे अधिक आत्महत्याओं का कलंक भी हमारे देश के माथे पर लगा हुआ है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक प्रतिदिन 26 युवा खुद को काल के गाल में झोंक रहे हैं और इस संताप की स्थिति का जन्म छात्र बेरोजगारी की गंभीर समस्या के कारण हुआ है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, भारत सरकार और विभिन्न एजेंसियों के ताजा सर्वेक्षण और रपट इस ओर इशारा करते हैं कि देश में बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ा है। जिन युवाओं के दम पर हम भविष्य की मजबूत इमारत की आस लगाए बैठे हैं उसकी नींव की हालत निराशाजनक है और हमारी नीतियों के खोखलेपन को राष्ट्रीय पटल पर प्रदर्शित कर रही है।आईएलओ ने जो अनुमान लगाया है, वह मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगारों की संख्या 2019 में 1.89 करोड़ तक बढ़ जाने का अनुमान लगाया गया है। आंकड़ों के अनुसार, भारत दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों का देश बन गया है।केंद्रीय श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार हर रोज 550 नौकरियां कम हुई हैं और स्वरोजगार के मौके घटे हैं। पिछले दिनों ं आई अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि साल 2019 आते-आते देश के तीन चैथाई कर्मचारियों और प्रोफेशनल्स पर नौकरी का खतरा मंडराने लगेगा या फिर उन्हें उनकी काबिलियत के मुताबिक काम नहीं मिलेगा। यही कारण है कि देश के लगभग हर राज्य में आए दिन बेरोजगार युवाओं के आन्दोलन जारी है।
यह देश का एक ऐसा सच है जिससे राजनीतिकों, नीति-नियंताओं तथा खुद को मुल्क का रहनुमा समझने वाले लोगों ने आंखें मूंद ली हैं। इक्कीसवीं सदी की बात करें तो 1,54,751 बेरोजगार अब तक खुदकुशी कर चुके हैं। इस तरह युवाओं का बेदम होना किसी राष्ट्र के बेदम होने का संकेत ही है। बेरोजगारी की समस्या वर्ष दर वर्ष और गंभीर होती जा रही है तो क्या मान लिया जाए की भारत बढ़ती खुदकुशियों के एक नए कीर्तिमान की ओर अग्रसर हो रहा है? मोदी सरकार ने किसानों की भलाई एवं बेरोगजारी समाप्त करने को लेकर को लेकर बड़े-बड़े दावे जरूर किये थे, लेकिन अब तक उसका कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका है। अब जबकि मोदी सरकार को चार वर्ष पूरे हो चुके है,उसकी जबाबदेही बनती है कि वह जनता को जबाब दे। वरना 2019 में किसान और बेरोजगार मोदी सरकार को जबाब देने को तैयार है।

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