अनुपम पाठक
पाली/हरदोई 28 अक्टूबर- एक समय था,जब कुआँ लोगों की प्यास बुझाने के प्रमुख साधन हुआ करते थे इन्हीं के पनघटों पर हमारी धार्मिक और पौराणिक परंपराये भी संपन्न हुआ करती थी।कुओं का निर्माण कराना मन्दिर मस्जिदो की तरह एक पूर्ण का कार्य समझा जाता था, लेकिन मशीनी करण और आधुनिकता की वजह से पनीहारीओ से गुलजार रहने वाले पनघट (कुओं के तट) सूने नजर आ रहे है। लोगों की कुओं के प्रति उपेक्षा और निरंतर घट रहे भूमिगत जल स्तर ने इनके अस्तित्व को ही खतरे मे डाल दिया है।धार्मिक स्थानों पर मन्दिर, मस्जिद,चर्च ,गुरुद्वारो के अलावा पुराने खंडहरो और गांवो मे कही कही अभी कुंओं के अवशेष देखने को मिल जाते है। हमारे पहले लोग यात्रा करते समय अपनी प्यास बुझाने के उद्देश्य से डोर और लोटा साथ मे लेकर चलते थे।राजा ,महाराजाओ, सेठ़ साहुकारो द्वारा धार्मिक स्थलो गांवों इत्यादि जगहो पर कुओं के निर्माण के साथ जानवरों और पशु पक्षियों के लिये बावड़ी बनाई जाती थी जो समस्त जीवधारियो की प्यास बुझाने के काम आता था। बेटे की शादी मे बारात प्रस्थान करने के पहले कुआँ विहाने की परंपरा थी। कुओं के खत्म होने के साथ इस परंपरा का भी स्वरूप बदल गया ।हमारे धार्मिक अनुष्ठानो के पहले जल श्रोतो की पूजा करने की परंपरा थी। कुओं और तालाबो से भूमिगत जल स्तर भी रिचर्ज हो जाता था। लेकिन हैण्ड पंपो एवं समरसैविल की वजह से कभी हमारे जीवन के अभिन्न अंग रहे कुओं के आस्त्वि को ही खतरे मे डाल दिया।

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