करीब 85 फीसदी मरीज हीमोफीलिया की बीमारी से होते हैं अपरिचित
लखनऊ। हीमोफीलिया के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाना बहुत जरूरी हो गया है। यह रक्तस्राव से जुड़ी जानलेवा बीमारी है। समय पर जांच से हीमोफीलिया का बेहतर इलाज हो सकेगा। जागरुकता होने से समय पर मरीज की पहचान के साथ इलाज संभव हो सकेगा। हीमोफीलिया की इस दुर्लभ बीमारी के बारे में लोगों को बहुत ही कम जानकारी है। करीब 85 फीसदी मरीज यही नहीं जान पाते हैं कि उन्हें हीमोफीलिया की बीमारी है।
हीमाफीलिया की जांच के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं
यह जानकारी हीमोफीलिया सोसायटी के सचिव विनय मनचंदा ने आज हीमोफीलिया फेडरेशन इंडिया की शाखा हीमोफीलिया सोसायटी लखनऊ की ओर से राजधानी में आयोजित एक कार्यक्रम में दी। उन्होंने कहा कि पीजीआई, केजीएमयू, बीएचयू जैसे संस्थानों में ही हीमोफीलिया की जांच होती है। ज्यादातर चिकित्सा केंद्रों में हीमाफीलिया की जांच के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं है। यूपी में अब तक हीमोफीलिया के केवल 2,650 मरीजों की पहचान हुई है। इस समय यूपी में 26 चिकित्सा केंद्रों में उच्च गुणवत्ता वाली फैक्टर रिप्लेसमेंट थेरेपी की सुविधा उपलब्ध है।
10 हजार में से एक व्यक्ति हीमोफीलिया के साथ जन्म लेता
जन जागरूकता के जरिये ज्यादा से ज्यादा हीमोफीलिया के मरीजों तक फैक्टर रिप्लेसमेंट, मॉनिटरिंग और फिजियोथेरेपी की पहुंच होगी और वे बेहतर व दर्दमुक्त जीवन जी सकेंगे। लोगों को रक्त से जुड़ी इस अनियमितता के बारे में बताना जरूरी है, ताकि अगर चोट के बाद जोड़ों में सूजन या ज्यादा रक्तस्राव जैसे लक्षण दिखें तो परिजन तत्काल जांच के लिए आगे आएं। वल्र्ड फेडरेशन ऑफ हीमोफीलिया के मुताबिक हर 10 हजार में से एक व्यक्ति हीमोफीलिया के साथ जन्म लेता है। इसलिए अनुमानित तौर पर भारत में करीब एक लाख लोग हीमोफीलिया के शिकार हैं।

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