बुद्ध पूर्णिमा पर बन रहे दुर्लभ योगों के असर की वजह से मंहगाई में बढ़ोतरी होगी। पूर्णिमा पर विशाखा नक्षत्र रहेगा, इसका स्वामी गुरु है। नवांश में भी शनि की दृष्टि सूर्य पर होगी, इससे विश्व के किसी हिस्से में भूकंपन के योग भी बन रहे हैं। अन्य प्राकृतिक आपदाएं भी आ सकती हैं। पूर्णिमा तिथि का 18 मई की सुबह 4.10 बजे से शुरू हो रही है। ये तिथि रात को 2.41 बजे तक रहेगी। इस पूर्णिमा को वैशाखी पूर्णिमा भी कहा जाता है। प्राचीन समय में भगवान बुद्ध का जन्म इसी तिथि पर हुआ था। इसीलिए इसे बुद्ध पूर्णिमा कहते हैं। इसी दिन भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार धारण किया था।
वैशाख मास के स्नान भी इसी दिन से समाप्त हो जाएंगे। पूॢणमा पर पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। स्नान के बाद गरीबों को धन का दान करें। व्रत करें। इस तिथि पर भगवान सत्यनारायण की कथा भी करनी चाहिए। शिवङ्क्षलग पर तांबे के लोटे से जल चढ़ाएं, चांदी के लोटे से दूध चढ़ाएं। ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। इस साल बुद्ध पूर्णिमाके दिन समसप्तक योग बनने से यह दिन और भी मंगलकारी माना जा रहा है। समसप्तक योग में शुभ कार्यों के स्वामी देवगुरु बृहस्पति व नवग्रहों के राजा सूर्यदेव आमने-सामने रहेंगे। इन दोनों के आमने-सामने होने से समसप्तक राजयोग बनेगा।
समसप्तक राजयोग होने के कारण 18 मई को सभी कार्यों में स्थायित्व के साथ उन्नति होगी। इस शुभ अवसर पर भूमि, भवन और वाहन की खरीद के साथ ही पदभार ग्रहण करना बहुत ही शुभ माना जाता है। नए काम की शुरुआत के लिए भी यह दिन बहुत शुभ माना जाता है। बुद्ध पूर्णिमा पर बन रहे दुर्लभ योगों के असर की वजह से मंहगाई में बढ़ोतरी होगी। पूॢणमा पर विशाखा नक्षत्र रहेगा, इसका स्वामी गुरु है। नवांश में भी शनि की दृष्टि सूर्य पर होगी, इससे विश्व के किसी हिस्से में भूकंपन के योग भी बन रहे हैं। अन्य प्राकृतिक आपदाएं भी आ सकती हैं। इस दिन सत्य विनायक व्रत रखने का विशेष विधान है।
मान्यता है कि इस दिन यह व्रत रखने से व्रती की दरिद्रता दूर होती है। उसके बिगड़े काम बनते हैं। इस शुभ योग में शिवभलग पर दूध चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है। वैशाख पूॢणमा को सत्य विनायक पूर्णिमा के तौर पर भी मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन श्रीकृष्ण ने उनसे मिलने पहुंचे उनके मित्र सुदामा को सत्य विनायक व्रत करने की सलाह दी थी, जिसके प्रभाव से उनकी दरिद्रता समाप्त हो सकी। इसके अलावा इस दिन धर्मराज की पूजा का भी विधान है। धर्मराज की इस दिन पूजा-उपासना से साधक को अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता है। इसे सोमवती पूॢणमा भी कहा जाता है। इस दिन गुरू का विशाखा नक्षत्र भी है। इस दिन भगवान बुद्ध की जयंती भी है जिसे बुद्ध पूॢणमा कहते हैं। इसी दिन भगवान बुद्ध को ज्ञान भी मिला था इसी दिन भगवान बुद्ध ने अपनी देह का त्याग भी किया था।
वैशाख पूर्णिमा भगवान बुद्ध के जीवन से बहुत गहराई से जुड़ी हुई है। इस दिन भगवान बुद्ध का ध्यान करना विशेष लाभदायक होता है। दुनिया भर में इस दिन भगवान बुद्ध की याद में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भगवान बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। इस दिन को दैवीयता का दिन भी माना जाता है। इस दिन ब्रह्म देव ने काले और सफेद तिलों का निर्माण भी किया था। अत: इस दिन तिलों का प्रयोग जरूर करना चाहिए। इस दिन बृहस्पति चंद्र का अद्भुत योग भी होगा।
स्वास्थ्य और जीवन का कारक सूर्य अपनी उच्च राशि में होगा। इसके अलावा सुख को बढ़ाने वाला ग्रह शुक्र भी स्वगृही होगा। इस पूॢणमा को स्नान और दान करने से चन्द्रमा की पीड़ा से मुक्ति मिलेगी। साथ ही साथ आॢथक स्थिति भी अच्छी होती जाएगी। मान्यता है कि इस दिन स्नान करने से व्यक्ति के पिछले कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाती है। यह स्नान लाभ की दृष्टि से अंतिम पर्व माना जाता है। बुद्ध पूर्णिमा पर बौद्ध मतावलंबी बौद्ध विहारों और मठों में इकट्ठा होकर एक साथ उपासना करते हैं।
दीप जलाते हैं। रंगीन पताकाओं से सजावट की जाती है और बुद्ध की शिक्षाओं का अनुसरण करने का संकल्प लेते हैं। इस दिन भक्त भगवान महावीर पर फूल चढ़ाते हैं, अगरबत्ती और मोमबत्तियां जलाते हैं तथा भगवान बुद्ध के पैर छूकर शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। धाॢमक ग्रंथों के अनुसार, महात्मा बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। इस दिन लोग व्रत-उपवास करते हैं। बौद्ध और भहदू दोनों ही धर्मों के लोग बुद्ध पूर्णिमा को बहुत श्रद्धा के साथ मनाते हैं। बुद्ध पूर्णिमा का पर्व बुद्ध के आदर्शों और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
चंद्रमा करेगा धन की अमृत वर्षा
शास्त्रों के अनुसार पूर्णिमा के दिन चंद्रमा, विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी की पूजा करने से चारो तरफ से सुख-समृद्धि और वैभव की प्राप्ति होती है। सिद्धि योग और सोमवार के चलते यह तिथि बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। कहते हैं पूर्णिमा पर ज्योतिष में बताए उपायों को विधि विधान से करने से जीवन में तमाम तरह की परेशानियों का अंत हो जाता है। चंद्रमा को सफेद रंग और शीतलता का प्रतीक माना गया है। इसलिए इस योग में दूध और शहद के उपाय से धन, मान-सम्मान में बढ़ोत्तरी होती है। पूर्णिमा की तिथि पर सुबह स्नान के बाद माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजन करने के बाद दिनभर अपने मन में ऊं सोम सोमाय नम: के मंत्र का जप करना चाहिए। पूर्णिमा की रात को कच्चे दूध में पूजा के उपयोग में लाने वाले शहद और चंदन को मिलाकर उसमें अपनी छाया देखें फिर चंद्रमा को अघ्र्य दें। इस तिथि को चन्द्रमा सम्पूर्ण होता है। या यूं कहें सूर्य और चन्द्रमा समसप्तक होते हैं।
इस तिथि पर जल और वातावरण में विशेष ऊर्जा आ जाती है। चन्द्रमा इस तिथि के स्वामी होते हैं। अत: इस दिन हर तरह की मानसिक समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। इस दिन स्नान, दान और ध्यान विशेष फलदायी होता है। इस दिन सत्यनारायण देव या शिव जी की उपासना अवश्य करनी चाहिए। भविष्य पुराण और आदित्य पुराण के अनुसार बैशाख पूर्णिमा अत्यन्त पवित्र और फलदायिनी बताई गयी है। इस दिन महीने भर से चले आ रहे बैशाख स्नान और महीने भर से चले आ रहे धामक अनुष्ठान आदि की पूर्णाहुति होती है। स्वाति नक्षत्र 27 नक्षत्रों में दान में पुण्य प्रदान करने वाला है।
इसके अधिपति वायुदेव हैं। इसी तरह सिद्धि योग के अधिपति गणेश है जो कि हर प्रकार के कार्य में सिद्धि प्रदान करने वाले हैं। तुला के चंद्रमा से वैभव में वृद्धि होगी। कहते है नक्षत्रों में स्वाति ऐसा नक्षत्र है जिसमें दान करने से पुण्य होता है जिसपर वायुदेव का आधिपत्य है। बता दें कि सिद्धी योग के स्वामी गणपति हैं जो अपने भक्तों को हर तरह की सिद्धी प्रदान करते हैं। तुला का चंद्रमा राज प्रताप देने वाला है। इसलिए भी इस दिन का खास महत्व है। इस दिन लक्ष्मी मां की भी खासकर पूजा की जाती है।
प्रात: काल स्नान के पूर्व संकल्प लें। पहले जल को सर पर लगाकर प्रणाम करें। फिर स्नान करना आरम्भ करें। स्नान करने के बाद सूर्य को अघ्र्य दें। साफ वस्त्र या सफेद वस्त्र धारण करें, फिर मंत्र जाप करें। मंत्र जाप के पश्चात सफेद वस्तुओं और जल का दान करें। चाहें तो इस दिन जल और फल ग्रहण करके उपवास रख सकते हैं। इस दिन खासकर अगर लक्ष्मी मां को प्रसन्न करना चाहते हैं तो पीपल के पेड़ के नीचे घी का दीया जलाएं।
पीपल के पेड़ पर इस दिन जल चढ़ाने से आपकी शनि की साढ़ेसाती कम हो सकती है। कुंवारी कन्याओं को खाना खिलाएं और उपहार दें। इससे कुछ अच्छा होगा। इस दिन हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए भसदूर और चमेली का तेल चढ़ाएं। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से व्रती को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। इस दिन विशेष तौर से सूर्योदय से पूर्व उठकर घर में साफ-सफाई जरूर करें। पूजा के दौरान गाय के घी का दीपक जलाएं। धूप करें और कपूर जलाएं। मां लक्ष्मी को मखाने की खीर, साबू दाने की खीर या किसी सफेद मिठाई का भोग लगाएं। पूजा के बाद सभी में प्रसाद बाटें. ध्यान रखें कि इस दिन घर में कलह का माहौल बिल्कुल न हो। इस दिन व्रती को जल से भरे घड़े सहित पकवान आदि भी किसी जरूरतमंद को दान करने चाहिये। स्वर्णदान का भी इस दिन काफी महत्व माना जाता है।
महात्मा बुद्ध का ज्ञान
महात्मा बुद्ध ने हमेशा मनुष्य को भविष्य की ङ्क्षचता से निकलकर वर्तमान में खड़े रहने की शिक्षा दी। उन्होंने दुनिया को बताया आप अभी अपनी जिंदगी को जिएं, भविष्य के बारे में सोचकर समय बर्बाद ना करें। बिहार के बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई और उनके ज्ञान की रौशनी पूरी दुनिया में फैली। महात्मा बुद्ध का एक मूल सवाल है। जीवन का सत्य क्या है? भविष्य को हम जानते नहीं है। अतीत पर या तो हम गर्व करते हैं या उसे याद करके पछताते हैं। भविष्य की भचता में डूबे रहते हैं। दोनों दुखदायी हैं। बुद्ध के जीवन में दो स्त्रियां बहुत अहम स्थान रखती हैं।
एक तो उनकी मौसी महापजापति गौतमी और दूसरी सुजाता जो उनके आत्मिक जन्म का निमित्त बनी। बुद्ध की जन्मदात्री मां उनके जन्म के बाद मर गईं लेकिन उनकी मौसी ने अपना दूध पिलाकर उनका पोषण किया। उसके लिए गौतमी ने अपने नवजात पुत्र को किसी और दाई को सौंपा और वह खुद बालक सिद्धार्थ का पालन करने लगी। गौतमी ने आगे चलकर बुद्ध से दीक्षा लेने की जिद की, उसके कारण संघ में स्त्री का प्रवेश हुआ, और वह बुद्धत्व को उपलब्ध हुई। दूसरी घटना है कि बुद्ध दिन रात बिना रुके ध्यान करते थे, इस वजह से उनका शरीर उपवास और तपस्या से क्षीण, अस्थिपंजर हो गया था। लेकिन एक पूॢणमा के दिन उन्होंने सारे नियम तोडऩे का निश्चय किया और सहज स्वीकार भाव में बैठ गए। भोर के समय सुजाता नाम की स्त्री अपनी मन्नत पूरी करने के लिए खीर बनाकर ले आई। बुद्ध को देख कर उसे लगा, वृक्ष देवता प्रगट हुए हैं।
उसने उन्हीं को भोग लगाया और खीर खाने की बिनती करने लगी। बुद्ध ने उसकी बिनती स्वीकार की और सुजाता के हाथ की खीर खाई। उसी दिन उन्हें बुद्धत्व की उपलब्धि हुई। उस दिन सुजाता उन्हें खीर नहीं खिलाती तो उनका शरीर नष्ट हो सकता था। बुद्ध की मां उनके जन्म के बाद नहीं रहीं थीं लेकिन उनकी मौसी ने अपना दूध पिलाकर उनका पोषण किया। महामानव वो होते हैं, जिन्होंने अपनी भजदगी में ताउम्र कुछ ऐसी मिसाल कायम की, जिसके कारण उनको भगवान का द$र्जा दिया गया। और वह अंत में देवत्व को प्राप्त होकर लोगों के पूज्य हो जाते हैं। उनके नाम पर एक विशेष धर्म जन्म लेता है।
जो उस व्यक्ति के विचारों को आगे ले जाने के लिए अपने अनुयायियों को बढ़ाते हुए लोगों के अंदर नई शक्ति और नई चेतना का संचार करता है। इन्हीं में से एक थे भगवान बुद्ध, जिन्हें बौद्ध धर्म का निर्माता भी कहा जाता है। भगवान बुद्ध समय की महत्ता को बेहद अच्छी तरह से जानते थे। वह अपना हर क्षण कभी भी व्यर्थ नहीं जाने देते थे। एक बार उनके पास एक व्यक्ति आया और बोला, तथागत आप हर बार विमुक्ति की बात करते हैं। आखिर यह दु:ख होता किसे है? और दु:ख को कैसे दूर किया जा सकता है? प्रश्नकर्ता का प्रश्न निरर्थक था। तथागत बेतुकी चर्चा में नहीं उलझना चाहते थे। उन्होंने कहा, ‘अरे भाई! तुम्हें प्रश्न करना ही नहीं आया। प्रश्न यह नहीं था कि दु:ख किसे होता है बल्कि यह कि दुख क्यों होता है? और इसका उत्तर है कि आप निरर्थक चर्चाओं में समय न गवाएं ऐसा करने पर आपको दु:ख नहीं आएगा।

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