खरीफ में अधिक उत्पादन लेने के लिए रसायनों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। हरित क्रांति एवं सिंचाई साधनों में बढ़ोत्तरी के परिणाम के तौर पर रसायनों का प्रयोग भी बढ़ता जा रहा है। इन रसायनों में खरपतवारनाशक, फफूंदीनाशक एवं कीटनाशक मुख्य हैं। पर्यावरण में कृषि के बदलते परिपेक्ष में कृषि रसायनों का वैज्ञानिक ढंगों से उचित एवं सही प्रयोग बहुत आवश्यक एवं महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए उचित ढंगों द्वारा सावधानी पूर्वक कृषि रसायनों का प्रयोग बहुत आवश्यक एवं महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए उचित ढंगों द्वारा सावधानी पूर्वक कृषि रसायनों का प्रयोग करना चाहिए।
हानिकारक जीवों को मारने वाले रासायनिक पदार्थों को पैस्टीसाईडज़ कहते हैं। पैस्टीसाईडज़ जहरों में कीटों को मारने वाले खरपतवारनाशक, फफूंदीनाशक, चूहेमार, नीमैटीसाईडज़, एकैरीसाईडज़ इत्यादि आते हैं जो कि भिन्न-भिन्न हानिकारक जीवों की किस्मों को मारते हैं। विश्व भर में 32 प्रतिशत काश्तकारी क्षेत्रफल कपास, धान, सब्जियों एवं फलों के अधीन है और इस पर तकरीबन 80 प्रतिशत कीटनाशक जहरों का प्रयोग होता है। दक्षिण-पूर्वी एशिया में भारत पैस्टीसाईडज़ जहरों का सबसे बड़ा उत्पादक है।
विश्व में कृषि रसायनों में सबसे अधिक बिक्री खरपतवारनाशकों (46.9) प्रतिशत की है और उसके बाद आते हैं कीटनाशक 29.1), फफूंदनाशक (18) प्रतिशत एवं अन्य (6) प्रतिशत। दूसरी तरफ यदि देखा जाए तो भारत में सबसे अधिक प्रयोग कीटनाशकों (73.3) का होता है और अन्य 12.8 प्रतिशत खरपतवारनाशक, 17.3 प्रतिशत फफूंदीनाशक एवं अन्यों का प्रयोग 1.16 प्रतिशत होता है।
कीटनाशकों के प्रयोग से फसलों के उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है परन्तु दूसरी तरफ कीटनाशकों के सुरक्षित प्रयोग एवं कई बार इनको प्रयोग करने की पूरी जानकारी प्राप्त न होने के कारण काफी नुकसान होता है। इनका लगातार प्रयोग करने से समाज की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है और जिनमें से विशेष तौर पर बच्चों के लिए यह अधिक नुकसानदायक होते हैं। किसानों में सामाजिक आर्थिक चिंता, बढ़ रहे खर्चों के कारण आमतौर पर पौध सुरक्षा के लिए प्रयोग किए जाते रसायन, कीटों में बढ़ रही प्रतिरोधिता एवं पुन: उत्थान, दूसरे दर्जें की कीटों का हानिकारक रूप धारण करना एवं मित्र कीटों की घट रही संख्या इत्यादि कारणों के कारण बढ़ रही है।
कीटों की उचित रोकथाम एवं उन्नत खेती के लिए कीटनाशकों का प्रयोग बहुत आवश्यक है। जहरों का दुरप्रयोग पर्यावरण को प्रदूषित करता है और मनुष्यता के लिए कई तरह की मुश्किलें पैदा करती हैं। इस पैस्टीसाईडज़ के प्रयोग से पहले इन रसायनों की जानकारी का होना बहुत आवश्यक है। इसके साथ-साथ आपको यह ज्ञान होना भी जरूरी है कि फसलों पर हमला करने वाले दुश्मन कौन है जिस कारण दवा का सही चुनाव हो सके।
कृषि रसायनों के प्रयोग का समय: कृषि रसायनों का प्रयोग सही समय पर करें। फसल की लगातार निगरानी करते रहें। एक सिरे से दूसरे सिरे तक अच्छी तरह से जांच करते रहना चाहिए। पौधों के पत्तों के नीचे एवं तरेड़ों में देखें कि कोई कीट या बीमारी तो नहीं लगी हुई। यदि आपको कीट या बीमारियों की सही जानकारी हो जाती है तो प्रयोग की जाने वाले जहर कौन से हैं, यह कैसे कार्य करेंगी इस बारे में भी ज्ञान होना आवश्यक है। आमतौर पर दो तरह के जहर कीट या बीमारियों पर नियंत्रण पाने के लिए प्रयोग की जाती हैं।
पहली छूह कर कार्य करने वाली (कंट्रैक्ट जहरें) जहरों के सम्पर्क में जब भी कोई कीट या बीमारी आती है उसको सीधे कंट्रोल करने के समर्थ होती है। दूसरी तरह के जहर जिनको सिस्टैमिक या अंतर-प्रवाही कहा जाता है। यह जहर पौधों में मिल कर कार्य करते हैं और पौधे के सिस्टम में चले जाते हैं। इस तरह कोई भी कीट पौधे पर हमला करता है, पौधे को खाते समय यह जहरें उसके शरीर में चला जाता हैं और कीट मर जाता हैं। यदि इन जहरों के कार्य करने के ढंग के बारे में ज्ञान हो तो कीट या बीमारियों पर प्रभावी ढंग से कम खर्चे पर नियंत्रण किया जा सकता है। इसलिए जहरों एवं कीटों/बीमारियों की सही जानकारी होना बहुत आवश्यक है।
फसलों पर हमला करने वाले मुख्य दुश्मन: कीट तीन तरह से फसल को नुकसान पहुंचाते हैं।
पत्ते कुतरने वाले: यह कीट पत्तों को खाकर नुकसान पहुंचाते हैं।
तना छेदक: यह कीट या सुडिय़ां तने या फल में जाकर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। गोभ की सूंड़ी, फल छेदक।
रस चूसक कीट: यह कीट पत्ते या तने में से रस चूसते हैं जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं। चूसक कीट फसलों में बीमारियां फैलाने में भी सहायक होते हैं। आमतौर पर वायरल बीमारियां इन कीटों के द्वारा ही फैलाई जाती हैं। सफेद मक्खी, तेला आदि। अन्य और कीट जैसे डसकी बग और बग एवं भूंडिय़ा भी हैं जो किसी तरह से फसलों पर हमला करती हैं यदि हमें कीटों की सही पहचान है तो उस अनुसार सही दवा स्प्रे करने के लिए विशेषज्ञों की सलाह ली जा सकती है।
बीमारियां: पौधों पर मुख्य बीमारियां पैदा करने वाले कीटाणु हैं:-
1. फंगस: पौधों पर सबसे ज्यादा फंगस या फफूंदी द्वारा बीमारियां पैदा होती हैं। जैसे धान में शीथ ब्लाईट, फाल्स समट इत्यदि।
2. जीवाणु: जीवाणु या बैक्टीरिया भी पौधों में बीमारियां पैदा करने में सहायक होते हैं जैसे धान में झुलस रोग या बैक्टीरिया ब्लाईट।
3. विषाणु/वायरस: वायरस रोग अधिकतर चूसक कीटों द्वारा फैलाया जाता है। यह बीमारियां जैसे ठूठी रोग इत्यादि सफेद मक्खी द्वारा फैलाया जाता है।
इसी तरह यदि किसान भाई फसलों पर हमला करने वाले दुश्मनों के प्रति पूरी तरह से सचेत हैं तो वह उचित ढंग से इस दुश्मनों पर नियंत्रण कर सकते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि किसान भाई सही जहर का सही ढंग से स्प्रे करने के लिए समर्थ होंगे जिससे जहरों का उचित प्रयोग होगा।
खरपतवार: खेतों में मुख्य तौर पर तीन तरह के खरपतवार पाये जाते हैं।
1. घास वाले खरपतवार: सवांक, गुल्ली डंडा इत्यादि।
2. चौड़े पत्ते वाले: गधां वेल, खंडी इत्यादि।
3. मोथा ग्रुप: डीला, मौथा।
खरपतवार नाशकों का प्रयोग करने का एक विशेष समय होता है और सिफारिशशुदा समय से पहले या बाद में प्रयोग करने से फसल को नुकसान होने की सम्भावना बनी रहती है और समूचा नियंत्रण भी नहीं होता। खरपतवारनाशकों का प्रयोग करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि सिफारिश के अनुसार उचित खरपतवार नाशक का उचित मात्रा में ही सही ढंग से, सही समय पर प्रयोग करें, गलत ढंग से प्रयोग करने से फसल को नुकसान हो सकता है। भिन्न-भिन्न फसलों में खरपतवार नियंत्रण के लिए अलग-अलग खरपतवार नाशक सिफारिश किये गये हैं जिनको मुख्य तौर पर तीन भागों में बांटा जा सकता है।
1. बिजाई से पहले प्रयोग किये जाने वाले खरपतवारनाशक (पी.पी.आई.): इस तरह के खरपतवार नाशक बिजाई से पहले या खेत की अंतिम तैयारी के समय छिड़क कर भूमि में मिला दिये जाते हैं जो कि खरपतवारों के बीजों को उगते ही नष्ट कर देते हैं, यदि कुछ उग भी जाते हैं तो शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। इनका प्रयोग स्प्रेयर, पावर स्प्रेयर एवं ट्रैक्टर माऊंटिड स्प्रेयर द्वारा भी किया जा सकता है। ध्यान रहे कि यह अधिकतर उडऩशील प्रकृति के होते हैं, इसलिए इनको छिड़काव के साथ ही या तुरंत बाद भूमि में गड़ाई द्वारा अच्छी तरह मिलाना बहुत आवश्यक है, अन्यथा इनका प्रभाव खत्म हो जाता है।
2. उगने से पहले व बिजाई के तुरंत बाद प्रयोग किये जाने वाले खरपतवारनाशक (पी.ई.): इस तरह के खरपतवारनाशक बिजाई के तुरंत बाद एवं खरपतवारों के उगने से पहले प्रयोग किये जाते हैं क्योंकि खरपतवार फसल से पहले उग जाते हैं। इस तरह यह खरपतवारनाशक उग रहे या उगे हुए खरपतवारों को नष्ट कर देते हैं और अन्य खरपतवारों को उगने से रोकते हैं। इन खरपतवारनाशकों के प्रयोग के समय यदि भूमि में थोड़ी नमी हो तो इनकी क्रियाशीलता बढ़ जाती है। यह चुनिंदा खरपतवारनाशक होते हैं। इस कारण फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते।
3. उगने के उपरान्त खड़ी फसल में प्रयोग किये जाने वाले खरपतवारनाशक (पी.ओ.ई.): इस तरह के खरपतवारनाशक फसल उगने के बाद या खड़ी फसल में छिड़के जाते हैं। यह चुनिंदा खरपतवारनाशक होते हैं जो भिन्न-भिन्न रासायनिक क्रियाओं द्वारा खरपतवारों को नष्ट करते हैं और फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते। यदि लगातार बिजाई करके या लगातार वर्षा होने के कारण या अन्य कारणों के कारण बिजाई से पहले (पी.पी.आई.) या खरपतवारों के उगने से पहले (पी.आई.), खरपतवारनाशकों का प्रयोग न किया जा सके तो बिजाई के बाद (पी.ओ.ई.) खरपतवारनाशक खड़ी फसल में प्रयोग किये जा सकते हैं। क्योंकि यह खरपतवारनाशक खड़ी फसल में प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए इनके प्रयोग के समय कुछ विशेष सावधानियों का ध्यान रखना चाहिए जेसे विशेष खरपतवारों के लिए सिफारिश के अनुसार उचित खरपतवारनाशक की सही मात्रा, सही समय व सही ढंग से छिड़काव करें, अन्यथा फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
कृषि रसायनों के प्रभावशाली छिड़काव के लिए निम्नलिखित बातों की ओर अवश्य ध्यान दें:-
1. कृषि रसायन खरीदते समय:
सिफारिशशुदा कृषि रसायन का ही प्रयोग करें।
बढिय़ा गुणवत्ता वाले कृषि रसायन विश्वसनीय स्रोतों से ही खरीदें।
रसायन के प्रयोग की अंतिम तिथि अवश्य देखें। तिथि खत्म हो चुके रसायन का प्रयोग न करें, अन्यथा प्रभावशाली कंट्रोल नहीं होगा।
रसायन का बिल अवश्य प्राप्त करें।
2. छिड़काव करने से पहले:
कृषि रसायन के डिब्बों पर दी गई हिदायतों को ध्यान से पढऩा चाहिए।
छिड़काव से पहले स्प्रे पंप में थोड़ा पानी डाल कर चला कर निश्चित कर लें कि यह ठीक ढंग से कार्य कर रहा है या नहीं। यदि ठीक तरह से कार्य न कर रहा हो तो मिस्त्री से ठीक करवा कर ही इसका प्रयोग करें।
सही नोजल का चुनाव करें। पुराने जंगाल लगे एवं चौड़े छेद वाली नोज़लों का प्रयोग करें। खरपतवारनाशकों के प्रयोग के लिए फलैट फैन या फ्ल्ड जैट एवं फफूंदीनाशक या कीटनाशकों के प्रयोग के लिए होलो कोन नोजल का ही प्रयोग करें।
छिड़काव करने से पहले थोड़ा मौसम का अनुमान लगा लें। जब तेज हवा न चल रही हो, गहरे बादल ना हों और वर्षा होने की सम्भावना न हो, तभी छिड़काव करें।
खेत में जाने से पहले रसायन की जानकारी डायरी (नोट बुक/ कागज) में लिख लें जिन में रसायन का व्यापारिक नाम, रासायनिक नाम, गाढ़ापन, निर्माण की तिथि, प्रयोग की अंतिम तिथि, निर्माता एवं विक्रेता का नाम लिखा हो।
3. छिड़काव करते समय: सिफारिशशुदा रसायन की उचित मात्रा का प्रयोग करें। रसायन की कम मात्रा कम असरकारक होती है और यदि अधिक मात्रा का प्रयोग करेंगे तो प्रतिरोधकता होने की सम्भावना रहेगी जिससे अगली बार रसायन कम असरदायक होगा और अधिक मात्रा में खरपतवारनाशकों के प्रयोग से फसल का भी नुकसान हो सकता है।
4. रसायन की मात्रा का पता लगाना: कई बार किसानों को रसायनों की प्रयोग की जाने वाली सही मात्रा के बारे में जानकारी नहीं होती, इसलिए किसान भाई स्वयं भी सूत्र द्वारा रसायन की सही मात्रा का पता लगा सकते हैं। इसलिए रसायन के डिब्बे पर उसका गाढ़ापन (प्रतिशत) ई.सी., डब्ल्यू, पी.जी., एस.पी., डब्ल्यू, एस.पी., एल या एस.एल. के रूप में लिखा होता है।
उचित मात्रा में (500-700 लीटर प्रति हैक्टेयर) पानी का प्रयोग करें।
छिड़काव करने की रफ्तार लगभग एक जैसी रखें। न ज्यादा धीरे व न ज्यादा तेज।
स्प्रे लाइनों के बराबर रखें ताकि दोबारा स्प्रे न हो। खेत में इधर-उधर स्प्रे न करें।
छिड़काव के दर्मियान बीच-बीच में स्प्रे थोड़ा हिलाते रहें या प्लास्टिक की छड़ी से दवा को मिलाते रहें।
स्प्रे पंप के नोजल एवं पौधों मे सही दूरी रखें। नोजल न तो अधिक नीचे हो और न ही अधिक ऊपर।
यदि छिड़काव करते समय नोजल में रूकावट आ जाए तो स्प्रे पंप को उतार कर उसके छेद को आराम से पानी या सूई द्वारा साफ करें।
जल्दबाजी में मुंह से हवा न करें। क्योंकि कई बार आंखों व नाक में दवाई के छिटे पडऩे की सम्भावना रहती है और नुकसान हो सकता है।
यदि स्प्रे करते समय थकावट, खुजली, उबासी या आंखों में जलन आदि महसूस हो तो जल्दी ही स्प्रे करना रोक दें। साबुन से अच्छी तरह से हाथ, पैर व मुंह धोकर खुली हवा में आराम करें और साफ पानी पीएं।
दवाओं को निशाने पर पहुंचाने का कार्य छिड़काव करने वाले यंत्र ही करते हैं। इसलिए इनका सही चुनाव एवं रख-रखाव करना बहुत आवश्यक है। हमारे देश में नुकसानदायक कीट, पौधों की बीमारियां एवं खरपतवार हर वर्ष करोड़ों रुपयों की फसलों का नुकसान करते हैं। इन जहरों का प्रयोग करते समय हमेशा याद रखना चाहिए कि यह रासायनिक पदार्थ बहुत जहरीले होते हैं। इनके अंधा-धुंध एवं लापरवाही से किये गये प्रयोग से हमारा चौगिर्द भी दूषित होता है। भिन्न-भिन्न तरह के तरल छिड़काव यंत्र विकसित किये गये हैं जिनमें हाथ से चलने वाले एवं पैर से चलने वाले यंत्र बाल्टी स्प्रे पंप, हाथ के दबाव से चलने वाले स्प्रेयर पंप, रोकर स्प्रेयर पंप एवं नैपसैक स्प्रेयर पंप प्रमुख हैं। इनका प्रयोग छोटे बागों, छोटे खेतों, गोदामों, पोल्ट्री फार्मों एवं रिहायशी क्षेत्रों में किया जाता है। जबकि 10 एकड़ से बड़े खेतों व बागों में स्प्रे यंत्रों में मशीनी शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
जिनकों उचित आकार के इंजन एवं ट्रैक्टर की ताकत द्वारा चलाया जाता है। फलदार वृक्षों एवं सब्जियों वाली फसलों के लिए उच्च दाब व उच्च आयतन वाले तरह स्प्रे यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। इस तरह के यंत्रों में रासायनिक घोल पर पंप द्वारा हवा का दबाव बनाया जाता है। यह घोल नोजल के सूक्ष्म छेदों द्वारा छोटी-छोटी बूंदों में बदल कर फव्वारे के रूप में फसल की सोधी जाने वाली सतह पर फैल जाता है। पाऊडर के रूप में फसलों पर छिड़काव करने के लिए डस्टर का प्रयोग किया जाता है। इनका प्रयोग कम पानी वाले खेतों में अधिक लाभदायक होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में एवं पानी भरे खेतों में नैपसैक स्प्रेयर पंप का प्रयोग किया जाता है।
छिड़काव यंत्रों का प्रयोग करने से पहले उनकी छिड़काव दर निश्चित करना आवश्यक है जिससे सही मात्रा में सही दबाव द्वारा फसलों पर एक सार छिड़काव करके कीटों, बीमारियों एवं खरपतवारों पर नियंत्रण किया जा सके। हाथ से चलने वाले छिड़काव यंत्रों की छिड़काव दर निम्नलिखित ढंगों द्वारा जानी जा सकती है:-
1. खेत में 10 वर्ग मीटर (2.5 मी0 4 मी0) क्षेत्र में चिन्ह लगा दें।
2. स्प्रेयर की टंकी को पानी से भरें और जिस स्तर तक पानी भरा गया है उस सतह पर टंकी में निशान लगा लें।
3. खेत में लगे निशान वाले क्षेत्र पर स्प्रेयर द्वारा साधारण दबाव पर एकसार छिड़काव करें।
4. टंकी में पहले से लगाये गये निशान तक दोबारा पानी भरें और भरे गये पानी की मात्रा नाप लें। यह छिड़काव किये गये पानी की मात्रा के बराबर होगी।
मान लें कि 10 वर्ग मीटर में छिड़काव किये गये पानी की मात्रा 1 लीटर एक वर्ग मीटर में छिड़काव किये गये पानी की मात्रा = 1 लीटर एक वर्ग मीटर में छिड़काव किये गये पानी की = लीटर/10 10,000 वर्ग मीटर (एक हेक्टेयर) में छिड़काव किये गये पानी की मात्रा = 1&10,000 लीटर/10 छिड़काव की दर = 1&1000 लीटर प्रति हेक्टेयर ताकत से चलने वाले छिड़काव यंत्रों की छिड़काव दर जानने के लिए निम्नलिखित सूत्रों का प्रयोग किया जाता है।
छिड़काव की दर लीटर प्रति हैक्टेयर नोजल का छिड़काव निकास (लीटर प्रति मिन्ट) ट्रैक्टर की गति (कि.मी. प्रति घंटा) स्प्रे पंप की कार्यकारी चौड़ाई, मीटर/600 यदि यह दर सिफारिश की गई दर से अलग हो तो निम्नलिखित में से कोई भी एक उपाय किया जा सकता है:-
1. छिड़काव का दबाव कम या अधिक किया जा सकता है।
2. नोजल का घेरा रसायनों के अधिक प्रयोग से बढ़ जाता है, जिस कारण छिड़काव की दर बढ़ जाती है। इसलिए आवश्यकता के अनुसार नोजल को बदल देना चाहिए।
3. छिड़काव के दौरान की रफ्तार को कम या अधिक करके दर को नियंत्रित किया जा सकता है। छिड़काव यंत्रों का प्रयोग करने से पहले योजना बनाना एवं सावधनियां: छिड़काव यंत्रों के उचित रख-रखाव एवं प्रयोग सम्बन्धी पहले से ही योजना बनाई जाए और सावधानियां प्रयोग की जाएं तो यह यंत्र लंबे समय तक सुचारू ढंग से प्रयोग किया जा सकें:
1. छिड़काव यंत्रों का प्रयोग करने से पहले इसकी टैंकी, पाईप एवं नोजल को अच्छी तरह से धो लेना चाहिए।
2. टैंकी में पानी भर का उसको चला कर देख लेना चाहिए कि स्प्रे पंप के सभी भाग ठीक ढंग से कार्य कर रहें हैं और किसी जग से किसी तरह का कोई रिसाव तो नहीं हो रहा।
3. टैंक में रासायनिक घोल पाने से पहले इसको अच्छी तरह छान लेना चाहिए।
4 छिड़काव करते समय शरीर को अच्छी तरह से ढक लेना चाहिए। हाथों में दस्ताने, पैरों में जूता एवं मुंह को अच्छी तरह से धो लेना चाहिए।
5. छिड़काव करते समय सिगरटनोशी नहीं करनी चाहिए। और किसी तरह का खाद्य पदार्थ नहीं खाना चाहिए।
6. हवा के बहाव की दिशा में ही छिड़काव करना चाहिए और छिड़काव करने वाले क्षेत्र में कोई बच्चा, व्यक्ति या पशु ना हो।
7 दवा को खुली हवा में मिलाएं और बच्चों को इससे दूर रखें।
8 ताकत से चलने वाले छिड़काव यंत्रों को खाली नहीं चलाना चाहिए।
9. इन छिड़काव यंत्रों को चलाने के लिए ट्रैक्टर या इंजन में आवश्यक मात्रा में तेल होना चाहिए। इंजन के क्रैक-केस में तेल की प्रतिदिन जांच करनी चाहिए, कार्बोरेटर या फ्यूल पंप का समय-समय पर साफ करते रहना चाहिए।
10 छिड़काव करते समय पंप को सिफारिश किये गये दबाव पर ही चलाएं।
मरम्मत व रख-रखाव:
1. छिड़काव का काम खत्म होने के बाद स्प्रे पंप में पानी डाल कर चलाएं जब तक कि टंकी में पानी खत्म न हो जाए।
2. उसके बाद छिड़काव यंत्र के निकासी पाईप नोजल एवं अन्य हिस्सों को अलग करके अच्छी तरह से धोकर दोबारा उसी जग पर लगाएं।
3. जब छिड़काव यंत्रों का प्रयोग न करना हो तो इनको अच्छी तरह से धोकर सूखी व ढकी हुई जगह पर रखना चाहिए।
4. रसायन के ज्यादा प्रयोग से नोजल की टिप का घेरा बढ़ जाता है जिस कारण बूंदों का आकार बड़ा व छिड़काव दर बढ़ जाती है। समय-समय पर नोजल के निकासी छिड़काव की जांच करते रहना चाहिए। जरूरत पडऩे पर नोजल को बदल लेना चाहिए।
5. पंप के वाशर में समय-समय पर तेल देते रहना चाहिए जिससे कि वाशर सूख कर टूट या क्रैक न हो जाए।
6. हमेशा साफ व छाने हुए रसायन का ही प्रयोग करना चाहिए।
7. घिसने वाले एवं घूमने वाले हिस्सों में ग्रीस देते रहना चाहिए।
8. जब छिड़काव यंत्र प्रयोग न करना हो तो उसमें रसायन डाल कर न रखें। इससे टंकी रसायन क्रिया के कारण खराब हो सकती है। इस तरह यदि किसान भाई सही समय पर सिफारिश शुदा पैस्टीसाईडज़ का प्रयोग करें तो वह खर्चों के साथ-साथ उत्पादन की बढ़ोत्तरी द्वारा पर्यावरण को भी प्रदूषित होने से बचा सकते हैं।
आवश्यकता है तो विशेषज्ञों से सही दिशा-निर्देश लेने की और इस ज्ञान को अमल में उतारने की। यह जहर खरीदते समय हमेशा ध्यान में रखें कि यह उत्पाद बढिय़ा कम्पनी के हों। खरीदे गये उत्पादों का बिल अवश्य लें।

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