नई दिल्ली। सैफ अली खान की Chef फूड, एम्बीशन और फैमिली को लेकर बुनी गई मॉडर्न फैमिली ड्रामा है, जिसमें एक प्यारी-सी कहानी है. इसमें एक महत्वकांक्षी शेफ है, अपने बेटे को प्यार करने वाला पिता है और एक सिंगल मदर है. सबसे खास बात यह कि इसमें रोड ट्रिप भी है. हॉलीवुड की हिट फिल्म Chef का यह ऑफिशल रीमेक है और राजा कृष्ण मेनन ने जॉन फेवरू की फिल्म के साथ पूरा इंसाफ भी किया है. फिल्म में सभी कैरेक्टर्स अच्छे लगते हैं, कहानी रिफ्रेशिंग लगती है और लंबे समय से इस तरह की अच्छी फिल्म का इतंजार भी था. हालांकि फिल्म हल्की-सी खींची हुई लगती है लेकिन अंत में चेहरे पर मुस्कान छोड़ जाती है तो इस बात को नजरअंदाज किया जा सकता है.
सितारे : सैफ अली खान, पद्मप्रिया, चंदन रॉय सान्याल, स्वर कांबले, मिलिंद सोमण, पवन चोपड़ा, शोभिता धूलिपाला, राम गोपाल बजाज
निर्देशक: राजा कृष्ण मेनन
निर्माता : भूषण कुमार, विक्रम मल्होत्रा, जननी रविचंद्रन
लेखक : रितेश शाह, सुरेश नायर, राजा कृष्ण मेनन
संगीत : रघु दीक्षित, अमाल मलिक
गीत : रश्मि विराग, अंकुर तिवारी
कहानी दिल्ली के रोशन कालरा (सैफ अली खान) की है, जिसका नाम उसे चैन से नहीं जीने देता है. उसे बचपन से खाना बनाने की लत लग जाती है और वह समय मिलते ही राम लाल छोले भठूरे वाले के पास खाना बनाने पहुंच जाता था. लेकिन पिता अपने बेटे को इंजीनियर बनाना चाहते हैं. बस वह घर छोड़कर भाग जाता है और अपने ख्वाबों का पीछा करते हुए, थ्री मिशलिन स्टार शेफ बन जाता है. लेकिन काम की वजह से पत्नी से तलाक हो जाता है और गुस्से की वजह से नौकरी छूट जाती है. बस किस तरह पत्नी, बेटा और दोस्त मिलकर इस शेफ को जिंदगी जीना और उसके खोए हुनर को लौटाते हैं, ‘शेफ’ उसी की कहानी है. फिल्म में छोटे-छोटे मूमेंट्स हैं जो चेहरे पर मुस्कान ला देते हैं, और कहानी भी बहुत ही प्यारी और आसान सी है. हालांकि सॉन्ग्स की वजह से थोड़ी खींची हुई लगती है. लेकिन सॉन्ग अच्छे हैं.
पुरानी दिल्ली की गलियों से अमृतसर होते हुए एक लंबा संघर्ष कर न्यूयॉर्क में सैटल हो चुके सेलेब्रिटी शेफ (मिशलिन 3 स्टार शेफ) रोशन कालरा (सैफ अली खान) की कहानी एक ऐसे ही घूंसे के बाद बिलकुल बदल जाती है। रेस्तरां का मालिक सुनील मनोहरि (पवन चोपड़ा), रोशन को नौकरी से निकाल देता है। रोशन को विश्वास है कि अगर वो गया, तो उसके साथी शेफ नजरुल (चंदन रॉय सान्याल) और विनि (शोभिता धूलिपाला), जिन्हें उसने ही प्रशिक्षित किया है, भी नौकरी छोड़ देंगे। लेकिन, ऐसा होता नहीं। यहां से शुरू होती है एक हारे हुए और निराश शेफ की जिंदगी की दूसरी पारी।
रोशन, भारत आ जाता है। कोच्चि में उसकी पत्नी राधा (पद्मप्रिया जानकीरामन) और 10-12 साल का बेटा अरमान (स्वर कांबले) रहते हैं। रोशन और राधा का तलाक हो चुका है, लेकिन दोनों के बीच अब भी अच्छा तालमेल है। बावजूद इसके, राधा की जिंदगी में एक नया व्यक्ति बीजू (मिलिंद सोमण) आ चुका है, जो कि एक बड़ा व्यापारी है। रोशन जिंदगी की एक नई शुरुआत के लिए बीजू के आइडिया पर एक पुरानी बस में चलता-फिरता रेस्तरां खोलता है। आइडिया काम कर जाता है और कोच्चि से निकला ये कारवां गोवा होते हुए दिल्ली खत्म होता है। इस बीच रोशन, अरमान और राधा की जिंदगी में कई मोड़ आते हैं, जिसके बाद इन तीनों की जिंदगी संभल जाती है।
बीते साल अक्षय कुमार को लेकर ह्यएयरलिफ्टह्ण जैसी सफल और सराहनीय फिल्म बना चुके निर्देशक राजा कृष्ण मेनन की यह फिल्म साल 2014 में आयी अमेरिकी कॉमेडी-ड्रामा ह्यशेफह्ण की आधिकारिक रीमेक है, जिसका निर्देशन ह्यआइरन मैनह्ण सिरीज और ह्यद जंगल बुकह्ण (2016) के निर्देशक जोन फॉव्रियो ने किया था। फॉव्रियो ने फिल्म में मुख्य भूमिका भी निभाई थी और इस फिल्म को तारीफ के साथ-साथ बॉक्स ऑफिस कामयाबी भी मिली थी।
एक डिश के रूप में अगर सैफ की इस फिल्म की सीधी तुलना फॉव्रियो की फिल्म से की जाए, तो इसमें न केवल मसालों की कमी लगती है, बल्कि ऐसा लगता है कि निर्देशक ने इसे ठीक तरह से पकाया भी नहीं है। मानो यह कोई ऐसी स्थिति है, जिसमें कई दिनों से भूखे किसी इंसान के सामने मुगलई, पंजाबी और चाइनीज व्यंजन एक साथ परोस दिए गए हों। अब या तो वो किसी एक खास का स्वाद चखे या फिर सारे स्वाद चख कर अपनी जबान और पेट दोनों खराब कर ले।
फिल्म के नाम और प्लॉट को देखें, तो ये कहानी एक सफल से असफल हुए शेफ की बात करती है, जिसकी अपनी पारिवारिक जटिलताएं भी हैं। फिल्म यहीं से शुरू भी होती है और इसी दिशा में आगे भी बढ़ती है। लेकिन, भारत आने के बाद रोशन इतना निश्चिंत सा रहता है कि जैसे उसे कहीं पहुंचना ही नहीं है। उसे जिंदगी को फिर से शुरू करने का मकसद उसकी पूर्व पत्नी का दोस्त देता है। ये सब देख ऐसा लगता है कि उससे ये जबरदस्ती कराया जा रहा है, जिसके लिए वह तैयार नहीं है।
एक पुरानी बस में चलता-फिरता रेस्तरां का विचार अच्छा है, लेकिन इसे चटपटा नहीं बनाया गया है। रोशन के आस-पास नजरुल और एलेक्स जैसे किरदार दिखते हैं, लेकिन एक जोरदार स्वाद वाली डिश के लिए इनका भरपूर इस्तेमाल नहीं किया गया। उस पुरानी बस को नया रूप देने से लेकर कोच्चि से दिल्ली तक के सफर को और स्वादिष्ट बनाया जा सकता था।
ये फिल्म प्रभावित करती है तो केवल सैफ, पद्मप्रिया, कांबली और सान्याल के अभिनय से। खासतौर से सैफ, जो लंबे समय बाद काफी सहज लगे हैं। दिखाई भी अच्छे दिए हैं। उनके डील-डौल से भारीपन गायब हो गया है और स्क्रीन पर वे फिर से अच्छे लगने लगे हैं। एक पिता-पुत्र का लगाव, मनमुटाव सरीखी कई बातें फिल्म में बांधे भी रखती हैं, लेकिन इंटरवल से पहले फिल्म कई जगह जमी सी रहती है। आपको ये भी पता रहता है कि आगे क्या होेने वाला है। एक निर्देशक के रूप में मेनन सैफ को एक शेफ के हाव-भाव देने में चूक गए।
हालांकि इस कहानी में वो तत्व थे जो किसी Chef की खास डिश की तरह लुभा सकती थी।
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