‘Mathura-A District Memoir’ लिखने वाले तत्कालीन कलेक्टर मथुरा थे फ्रेडरिक सिल्वन ग्राउज
रेल संग्रहालय की रूकावट पर रोष,
तृतीय रेल दिवस समारोह पर जताया आक्रोश
मथुरा। भारत विद्या की सतत खोज में विश्वविख्यात मथुरा संग्रहालय की स्थापना, हिन्दुत्वोद्धारक महाकाव्य श्रीरामचरितमानस का अंग्रेजी अनुवाद और उसकी चौपाइयों को प्राथमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल कराने की प्रथम पेशकश, राजभाषा हिन्दी के आदि उन्नयन समेत पुरातात्विक स्थलों एवं स्मारकों के जीर्णोद्धार, प्रथम रेल संचालन के अतिरिक्त ‘मथुरा-ए-डिस्ट्रिक्ट मेम्वायर’ के लेखन कौशल ने तत्कालीन कलेक्टर फ्रेडरिक सिल्वन ग्राउज को भले ही आधुनिक मथुरा का निर्माता और ब्रज समेत भारतीय संस्कृति का अनन्य उपासक तथा संवाहक बना दिया हो।
अब इसे गुलाम भारत की बदकिस्मती कहें या फिर आजाद हिन्दुस्तान की फिरकापरस्ती कि विलक्षण मेधाशक्ति और अनवरत नैष्ठिक साधना में अपनी समकालीन विभूतियों से श्रेष्ठतर होने के बावजूद बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न भारतीयतासर्जक प्रशासक एवं विद्वान को भारत के इतिहास में समुचित स्थान नहीं दिया गया।
यह सवाल डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में गुरूवार को जंक्शन स्टेशन पर मथुरा-हाथरस के बीच 19 अक्टूबर 1875 को प्रथम रेल सेवा शुरू होने की यादगार में दीपावली के दिन आयोजित तीसरे रेल दिवस समारोह में उठाया गया।
संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं ग्राउज मेमोरियल रेल संग्रहालय परियोजना के सूत्रधार डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि आजाद भारत की सरकारें उस महान विदेशी विद्वान के योगदानों से मुँह फेरती रही हैं जिसने भारतीयता की अनन्य उपासना में न केवल तन और मन बल्कि एक लाख रूपये का अकूत धन व्यय कर मथुरा में रेल संचालन का सपना साकार किया था। आगे कहा कि मौजूदा सरकार भी स्वार्थसिद्धि के लोभवश स्वीकृत प्रस्ताव को अमल में नहीं ला रही है। लिहाजा हर ऐसे दुष्प्रयास को देशद्रोह के बराबर ही माना जायेगा जिसे निजी स्वार्थों के चलते रोका जा रहा हो।
डॉ0 शर्मा ने रोष जताया कि विगत 8 वर्षों से संघर्ष का इतिहास बनते आये प्रस्ताव के प्रति रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा भी गौरवान्वित शैक्षणिक पृष्ठभूमि रखने के बावजूद पारदर्शी व्यवहार नहीं रख सके और फरवरी 2014 में ज्ञापन सौंपे जाने के बाद से उसे तब तक दबाये बैठे रहे, जब तक कि महामना स्मारक परियोजना को लेकर तल्खी नहीं हो गयी। फिर जब कार्यकारी निदेशक (विरासत) मनु गोयल और उप निदेशक एच0 सी0 बांगा के जरिये बातचीत आगे बढ़ी और उनके निर्देश पर स्थानीय रेल प्रशासन की ओर से सीनियर सेक्शन इंजीनियर ए0 के0 गौतम ने संस्थान के सहयोग से विभागीय प्रस्ताव प्रेषित किया, तब भी भारतीय रेल को नई दिशा प्रदान करने वाला रचनात्मक प्रस्ताव अमल में नहीं लाया जा सका। इसी क्रम में परियोजना के बाबत हीलाहवाली को देखते हुए जब आर0 टी0 आई0 के जरिये प्रधान मंत्री से शिकायत की गई और तदनुसार एस0 एस0 पाराशर डिवीजनल मेकैनिकल इंजीनियर, आगरा के साथ बैठक में विस्तार से चर्चा की गई, तब भी ऊपरी उपेक्षा ने सार्थक परिणाम नहीं निकलने दिया।
डॉ0 शर्मा ने खुलासा किया कि परियोजना के मूर्तन से न केवल मथुरा के रेल इतिहास के वे गुमनाम अध्याय उजागर होंगे बल्कि राष्ट्रीय इतिहास और स्वाधीनता आन्दोलन के कई रहस्यों से पर्दा भी उठाया जा सकेगा। कहा कि महात्मा गाँधी का मथुरा में वस्त्र त्याग ऐसा ही एक उदाहरण है जो गफलत में छिपा रहा और राष्ट्रीय स्तर पर नहीं उभर सका। वरना कोई वजह नहीं थी कि उसे ब्रजकृष्ण चाँदीवाला की डायरी से निकालकर एटनबरो की ‘गाँधी’ फिल्म में दर्शाने से रोका जा सकता हो। इसके अलावा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, पण्डित मोतीलाल नेहरू, पण्डित जवाहरलाल नेहरू, विट्ठलभाई पटेल, सी0 राजागोपालाचारी, खान अब्दुल गफ्फार खान, अटल बिहारी बाजपेई, भारतेन्दुमण्डल के प्रख्यात साहित्यकार राधाचरण गोस्वामी एवं पण्डित दीनदयाल उपाध्याय आदि के जीवन से जुड़े स्थानीय रेल प्रसंग वह मिसाल कायम कर सकते हैं जो पूरे देश के लिए मॉडल बन सकती है। मगर इसके लिए रेल प्रशासन को एफ0 एस0 ग्राउज जैसे निष्ठावान प्रशासक से प्रेरणा लेनी होगी जिन्हें अपने महान योगदानों के लिए डेढ़ सौ वर्षों वाद भी याद किया जा रहा है।
डॉ0 शर्मा ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने मौजूदा कार्यकाल के दौरान परियोजना को मूर्तरूप नहीं प्रदान किया तो प्रतिक्रिया में उपजनेवाला आन्दोलन सड़क से लेकर संसद तक पहुँचाया जायेगा।
इससे पूर्व उपस्थितों ने सेठ लखमीचन्द और एफ0 एस0 ग्राउज के चित्रपटों पर पुष्पार्चन से आयोजन की शुरूआत की। तत्पश्चात् आयोजन स्थल भारतमाता, सेठ लखमीचन्द और एफ0 एस0 ग्राउज के जयकारों एवं ‘देश का होगा तभी विकास, याद करोगे जब इतिहास’ ‘जब तक सूरज चाँद रहेगा, ग्राउज, लखमीचन्द का नाम रहेगा’ जैसे नारों से गूँज उठा।
इस अवसर पर जनसम्पर्क के अन्तर्गत श्यामाश्याम रसिकजी, जीतन ठाकुर, कृष्ण बल्लभ शर्मा, केशव देव शास्त्री, पवन कुमार, जे0 एन0 सचदेवा, विनोद गिनोवा, जावेद खान एडवोकेट, कृष्ण चन्द्र पाल, सुदेव पाल, मुन्नोजी, अमर चन्द, महंगू, बद्रीप्रसाद, यादराम, संजय कुमार, विजय कुमार, ओ0 पी0 सोमानी, अंकित सिंह, भानू जैन का मार्गदर्शन किया गया।
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