नई दिल्ली। ‘पद्मावती’ फिल्म को लेकर छिड़े विवाद के बीच कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं के बयानों पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई है।
शीर्ष अदालत ने बयानबाजी करने वाले नेताओं को नसीहत देते हुए कहा कि जब यह फिल्म मंजूरी के लिए लंबित है, तब सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग कैसे यह बयान दे सकते हैं कि सेंसर बोर्ड को इस फिल्म को पास करना चाहिए या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि ऐसा करने से सेंसर बोर्ड का निर्णय प्रभावित होगा। बता दें कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात के मुख्यमंत्री फिल्म ‘पद्मावती’ को अपने राज्यों में रिलीज न होने देने का ऐलान कर चुके हैं।
दूसरी तरफ कोर्ट में भंसाली के अधिवक्ता के तौर पर मौजूद हरीश साल्वे ने शीर्ष अदालत को भरोसा दिलाया कि फिल्म पद्मावती को दूसरे देशों में भारत में मंजूरी मिलने से पहले रिलीज नहीं किया जाएगा। उन्होंने दूसरे देशों में 1 दिसंबर को फिल्म को रिलीज करने की खबरों को गलत करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने पद्मावती के निर्माता-निर्देशक पर आपराधिक मामला दर्ज किए जाने की वकील एम. एल. शर्मा की याचिका को खारिज कर दिया। शर्मा ने फिल्म की रिलीज पर ही रोक लगाने की मांग की थी। यही नहीं, अदालत ने अर्जी को बेवजह करार देते हुए याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार भी लगाई।
सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म को लेकर बयानों पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा, ‘जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों का ऐसे बयान जारी करना अवांछनीय है। इससे सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचेगा और यह कानून के सिद्धांत के भी खिलाफ है।’
अदालत ने कहा कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को कानून का पालन करना चाहिए और ऐसी किसी फिल्म पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए, जिसे सेंसर बोर्ड से मंजूरी नहीं मिली हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग टिप्पणियां करेंगे तो सेंसर बोर्ड के मेंबर्स पर इसका असर होगा और संस्था का निर्णय प्रभावित हो सकता है।
-एजेंसी
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