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Wednesday, 27 June 2018

सीएंडडी वेस्ट से बन रही है सुप्रीम कोर्ट की नई इमारत

प्रगति मैदान के पास 12.19 एकड़ में साल 2015 से सुप्रीम कोर्ट की नई बिल्डिंग का निर्माण चल रहा है। जो पुराने परिसर से एक अंडर पास के जरिये जुड़ी रहेगी। CPWD द्वारा बनाई जा रही इमारत को ‘ग्रीन बिल्डिंग’ भी कहा जाता है, क्योंकि इस परिसर के बड़े हिस्से का निर्माण कचरे से हुआ है। जी बिलकुल सच है कि सुप्रीम कोर्ट की नई इमारत सीएंडडी वेस्ट से बन रही है। इस पूरी इमारत में जिन टाइल्स, कर्ब स्टोंस और ईंटों का इस्तेमाल किया जा रहा है वो पूरी तरह कचरे को प्रोसेस करके बनाई गई हैं।

इसके लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत बुराड़ी और शास्त्री पार्क में वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट लगाए गए हैं। शास्त्री पार्क प्लांट के सीनियर मैनेजर संदीप मल्होत्रा बताते हैं कि पूर्वी दिल्ली नगर निगम और IL&FS एन्वायरमेंट ने मिलकर इस प्रोजेक्ट को शुरू किया। प्लांट लगाने के लिए ज़मीन एमसीडी ने दी और कचरा भी वही उपलब्ध कराती है। IL&FS ने 22 करोड़ की लागत से ये प्लांट लगाया है।

फिलहाल ये दोनों प्लांट मिलकर रोजाना 5000 ईंटों का उत्पादन करते हैं, जिनका इस्तेमाल सरकारी प्रोजेक्ट्स के लिए ही किया जाता है। इसके लिए साल 2015 में दिल्ली की तीनों एमसीडी और एनडीएमसी ने मिलकर शहर की 168 जगहों को इस तरह के कचरे की डंपिग साइट्स के रूप में चुना। इनमें से 20 EDMC के अंतर्गत ही आते हैं और प्लांट को कचरा यहीं से उपलब्ध कराया जाता है।

सीनियर मैनेजर के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के नए परिसर की मुख्य बिल्डिंग का निर्माण पूरी तरह इन्हीं ईंटों से किया गया है। इसके लिए दोनों प्लांट्स ने मिलकर करीब 18 लाख ईंटों की सप्लाई की है। इसके आलावा नॉर्थ एवेन्यू में सांसदों के लिए बन रहे सरकारी आवास के लिए भी इन्हीं ईंटों का इस्तेमाल किया जा रहा है। ईंटों के आलावा कचरे से टाइल्स भी बने जा रहीं हैं, जिनका इस्तेमाल फुटपाथ बनाने में किया जा रहा है।

दरअसल ईंट बनाने के लिए ज्यादातर कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन वेस्ट (निर्माण और तोड़फोड़ के दौरान निकाला कचरा) का इस्तेमाल किया जाता है। पुरानी बिल्डिंग्स को ध्वस्त करने से इस तरह का कचरा सबसे ज्यादा पैदा होता है और दिल्ली में हो रहे लगातार निर्माण के चलते बीते 10 सालों में इस कचरे में काफी इज़ाफा हुआ है। संदीप के मुताबिक, शास्त्री पार्क में रोजाना 500 टन से कचरा प्रोसेस किया जाता है।

सबसे पहले कचरे की ढुलाई होती है और प्लास्टिक, लकड़ी और पत्थर को अलग कर लिया जाता है। इसके बाद इसे छाना जाता है और जो 20-60, 10-20 और 3-10 मिलीमीटर वाली वेस्ट को अलग-अलग कर देती है। इसके बाद मशीन में रेत और मिट्टी को भी अलग कर लिया जाता है। इसके बाद इसे प्रोसेस कर ईंटे बनायीं जाती हैं। बता दें कि ये प्लांट भी पूरी तरह प्रदूषण मुक्त बनाया गया है और यहां पानी भी रिसाइकिल कर इस्तेमाल किया जाता है।

इस एक ईंट का साइज़ सामान्य लाल ईंट से लगभग पांच गुना होता है और इसकी कीमत 29 रुपये प्रति ईंट तय की गई है। संदीप बताते हैं कि इस ईंट की मजबूती भी सामान्य ईंट जितनी ही है और इसकी उम्र उससे बेहतर ही मानी जाती है। साथ ही ये सीएंडडी वेस्ट को इस्तेमाल में लाकर पर्यावरण को नुकसान से बचाती है और कचरे का प्रबंधन भी करती है, बता दें कि इससे पहले तक सीएंडडी वेस्ट को भी लैंडफिल में डंप किया जाता था। संदीप के मुताबिक देश भर में सिर्फ ऐसे दो ही प्लांट हैं जो इस स्तर पर ये काम कर रहे हैं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), रुड़की के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित करने का दावा किया है जिसमें पॉलिमर तत्व एचडीपीई या उच्च घनत्व वाली पॉलीथीन सामग्री, कुछ रेशेदार तत्वों और संस्थान द्वारा विकसित किए गए खास तरह के रसायन के उपयोग से इस तरह के उत्पादों का निर्माण किया जा सकता है।

आईआईटी, रुड़की के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिक डॉ. शिशिर सिन्हा के मुताबिक, यह बेहद आसान तकनीक है, जिसका उपयोग सामान्य लोग भी कर सकते हैं। इसके लिए प्लास्टिक, रेशेदार सामग्री और रसायन के मिश्रण को 110 से 140 डिग्री पर गर्म किया जाता है और फिर उसे ठंडा होने के लिए छोड़ देते हैं। इस तरह एक बेहतरीन टाइल या फिर ईंट तैयार हो जाती है। प्लास्टिक कचरे, टूटी-फूटी प्लास्टिक की बाल्टियों, पाइप, बोतल और बेकार हो चुके मोबाइल कवर इत्यादि के उपयोग से इस तरह के उत्पाद बना सकते हैं। रेशेदार तत्वों के रूप में गेहूं, धान या मक्के की भूसी, जूट और नारियल के छिलकों का उपयोग किया जा सकता है।

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