जौनपुर। भारत गांवों का देश है जहां का मुख्य पेशा कृषि ही है। यह कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। गांवों के अन्नदाताओं के परिश्रम से ही हमें भरपेट भोजन मिलता है। पेट भरने से हम तो खुशहाल हैं जबकि अन्नदाता हाड़तोड़ मेहनत करके भी बदहाल हैं। अंधाधुंध रसायनिक खादों के प्रयोग, उचित सीमा से अधिक पानी से किसान को कृषि पैदावार के लागत मूल्य में पूर्व की अपेक्षा कई गुना बढ़ोत्तरी हो चुकी है।

वहीं इससे खेतों की सेहत तो लगातार बिगड़ते ही जा रही है, रसायनिक खादों से पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है। फसलों के लिए अधिक जल दोहन के चलते जल स्तर भी पाताल की ओर खिसकता जा रहा है। ऐसे में जिले के कुछ किसान कम पानी और जैविक खादों का प्रयोग कर भी अच्छा उत्पादन कर रहे हैं। धर्मापुर विकास खण्ड के केशवपुर गांव निवासी लक्ष्मी नारायण मौर्य पिछले कई वर्षो से जैविक खेती कर प्रत्येक मौसम में भरपूर उत्पादन प्राप्त करते है। उन्होंने बताया कि पूर्व में अपने खेतों में रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों का प्रयोग करता था। जिससे मेरे खेतों को नुकसान तो पहुंचता था, खर्च भी ज्यादा होने से खेती महंगी साबित हो रही थी। खेतों में पानी भी ज्यादा लगता था। उसके बाद मैंने जैविक खाद डाल कर खेती शुरु की। तब पैदावार में एक दो साल तक तो अंतर आया कितु उसके बाद से वहीं खेत अच्छा उत्पादन देने लगे। उसके बाद मैंने पानी की बचत के लिए खेतों के आर पर मेड़ों का निर्माण करा दिया। इससे जल संचय का काम भी शुरू हो गया और खेतों में नमी भी ज्यादा समय तक रहने लगी।

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