फतेहपुर। गंगा की बालू की तरह राजनीति की मुट्ठी ढीली होते ही फतेहपुर संसदीय सीट से क्षत्रियों का एकाधिकार ऐसा फिसला कि वीपी के बाद फिर कोई लंबरदार सर्वोच्च सदन की ड््योढ़ी नहीं लाँघ पाया। संसदीय इतिहास में यहाँ से चार बार क्षत्रिय सांसद हुआ, किन्तु ठाकुर महेंद्र प्रताप नारायण सिंह, देवेन्द्र प्रताप सिंह गौतम, ककऊ सिंह और अन्त में पूर्व मंत्री अचल सिंह की बड़ी पराजय ने क्षत्रिय राजनीति की दशा एवं दिशा बदल दी। अब राजनीति की बिशात में क्षत्रिय का वो मान नहीं रहा! डेढ़ दशक से तो किसी दल ने किसी लंबरदार को प्रत्याशी बनने लायक नहीं समझा। ब्राह्मणो से बैमनस्ता के चलते लोकसभा का सफर दूर की कौड़ी साबित हुआ। संख्या बल के आधार पर निर्णायक भूमिका में होने के बावजूद कद्रदानों ने ऐसा साथ छोड़ा कि अब न सूरत बची है और न कायदे की शीरत!
फतेहपुर संसदीय सीट के इतिहास में सर्वप्रथम १९६७ में कांग्रेस ने सन्तबख्स सिंह को बतौर क्षत्रिय यहाँ से टिकट दिया था, पहला क्षत्रिय सांसद बनने के बाद जिले की क्षत्रिय राजनीति ने अंगड़ाई ली और १९७१ में भी सन्तबख्स सिंह को कांग्रेस ने टिकट दिया और वह बड़े अंतर से दिल्ली पहुँचे। आपातकाल की आँधी में देश की सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस के साथ साथ सन्तबख्स सिंह का चुनाव भी हवा में उड़ गया। लगभग बारह वर्षों तक फतेहपुर की राजनीति में गैर क्षत्रिय चौपड़ सजी रही।
१९८९ में बोफोर्स की तोपो में कथित दलाली को मुद्दा बनाकर फतेहपुर पहुँचे राजा माँड़ा विश्वनाथ प्रताप सिंह के पदार्पण से स्थानीय राजनीति में क्षत्रिय ऐसा हावी हुआ कि उस समय के विकास दूत केन्द्रीय मन्त्री हरीकृष्ण शास्त्री की राजनीति ही हवा में उड़ गई। फतेहपुर से बड़ी जीत के बाद राजा माँड़ा देश के प्रधानमंत्री बने और १९९१ में हुए एक और मध्यावधि चुनाव में और बड़ी जीत के साथ लोकसभा पहुँचे।
फतेहपुर संसदीय सीट से वीपी सिंह दो बार सांसद हुए और यहाँ क्षत्रिय राजनीति को नई दिशा दी, किन्तु जिले के क्षत्रिय उस समय अपने आपको अपमानित महसूस करने लगे जब वीपी ने यहाँ अपने लाखों समर्थकों का मान मर्दन करते हुए लोकसभा की सदस्यता त्याग दी और इसी के साथ फतेहपुर सीट पर क्षत्रिय राजनीति के दुर्दिन शुरू हो गये।
भाजपा ने १९९६ में तत्कालीन हसवां विधायक महेन्द्र प्रताप नारायण सिंह को प्रत्याशी बनाया। यह वही दौर था जब पहली बार बहुजन समाज पार्टी का संसदीय चुनाव में प्रभावी आगाज हो रहा था और जिले की आबो-हवा में निषाद राजनीति की इंट्री हो रही थी। महेन्द्र प्रताप नारायण सिंह का अच्छा-खासा चुनाव परवान चढ़ती गैर सवर्ण राजनीति की भेंट चढ़ गया और अप्रत्याशित ढंग से आये परिणामों ने क्षत्रिय राजनीति को ऐसा झकझोरा कि फिर कभी क्षत्रिय प्रत्याशी ठिकाने से अपनी मौजूदगी का अहसास नहीं कर पाया।
१९९६ में जनता दल ने पूर्व विधायक कृष्ण कुमार उर्फ ककऊ सिंह को प्रत्याशी बनाया, किन्तु उनका प्रदर्शन अत्यंत औसत दर्जे का रहा। १९९८ में इस सीट पर समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस छोड़कर आये देवेन्द्र प्रताप सिंह गौतम को प्रत्याशी बनाया, किन्तु वे भी कोई चमत्कार नहीं कर सके। देवेन्द्र की पराजय से भी क्षत्रिय राजनीति को झटका लगा। समाजवादी पार्टी ने २००४ में पुनः क्षत्रिय कार्ड खेला और पूर्व मंत्री अचल सिंह को प्रत्याशी बनाया, किन्तु अचल भी चल नहीं पाये और बसपा से हार गये। पिछले डेढ़ दशक के दरमियान हुए संसदीय चुनावो में किसी भी दल ने क्षत्रिय प्रत्याशिता की ओर रूख नहीं किया। मौजूदा चुनावों में खासकर भाजपा से कई कद्दावर क्षत्रिय नेता टिकट की लाइन में काफी आगे तक तो गये किन्तु अंत्वोगत्वा तरजीह नहीं मिल पाई!
फतेहपुर की राजनीति में कई कद्दावर क्षत्रिय नेता हुए है। बाबू जय नारायण सिंह, अमरनाथ सिंह अनिल, बृजराज सिंह, अभिमन्यू सिंह, ठा० युवराज सिंह, बरदानी सिंह, अचल सिंह, महेन्द्र प्रताप नारायण सिंह, उदय प्रताप सिंह, ककऊ सिंह, जनसेवक अमरजीत सिंह, रणवेंद्र प्रताप उर्फ धुन्नी सिंह, पीयूष नाथ सिंह, देवेन्द्र प्रताप सिंह गौतम, समरजीत सिंह, अभय प्रताप सिंह, संजय सिंह, विक्रम सिंह, स्वरुप राज सिंह आदि ऐसे चर्चित चेहरे रहे जिन्हें उचित मुकाम नहीं मिला।
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Sunday, 21 April 2019
कभी था क्षत्रिय केंद्र, आज ओझल हो गई तस्वीर
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