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Saturday, 20 April 2019

दोनों ही ऋतुओं में उगाई जाती है भिंडी : लाभदाई नकदी फसल

भूमि व खेत की तैयारी
भिंडी के लिये दीर्घ अवधि का गर्म व नम वातावरण श्रेष्ठ माना जाता है। बीज उगने के लिये 27-30 डिग्री सेग्रे. तापमान उपयुक्त होता है तथा 17 डि से. ग्रे से पर बीज अंकुरित नहीं होते। यह फसल ग्रीष्म तथा खरीफ, दोनों ही ऋतुओं में उगाई जाती है। भिंडी को उत्तम जल निकास वाली सभी तरह की भूमि में उगाया जा सकता है। भूमि का पी एच. मान 7 से 7.8 होना उपयुक्त रहता है।
उत्तम किस्में
पूसा ए -4 : यह भिंडी की एक उन्नत किस्म है। यह पीतरोग येलोवेन मोजोइक रोधी है। फल मध्यम आकार के गहरे, कम लेस वाले तथा आकर्षक होते हैं। बोने के लगभग 15 दिन बाद से फल आना शुरू हो जाते हैं। इसकी औसत पैदावार ग्रीष्म में 10 टन व खरीफ में 15 टन प्रति है. है।
परभनी क्रांति : यह कि़स्म पीत-रोगरोधी है। फल बुआई के लगभग 50 दिन बाद आना शुरू हो जाते हैं। फल गहरे हरे एवं 15-18 सेंमी. लम्बे होते हैं। इसकी पैदावार 9-12 टन प्रति है. है।
पंजाब -7 : यह किस्म भी पीतरोगीरोधी है। फल हरे एवं मध्यम आकार के होते है। बुआई के लगभग 55 दिन बाद फल आने शुरू हो जाते है। इसकी पैदावार 8-20 टन प्रति है. है। इसके अलावा भिंडी की अन्य उन्नत किस्में है -पंजाब पद्मिनी , हिसार उन्नत व वर्षा उपहार।
बीज की मात्रा व बुआई का तरीका
सिंचित अवस्था में पंजाब, राजस्थान व हरियाणा में 2.5 से 3 किग्रा. तथा असिंचित दशा में 5-7 किग्रा. प्रति हेक्टेअर की आवश्यकता होती है। उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में 5 से 7 किग्रा. प्रति हेक्टेअर बीज कीझ संस्तुति दी गयी है। लाइन से लाइन की दूरी 30 सेंमी., पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंमी. व 2 से 3 सेंमी. गहरी बुवाई करनी चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में 30 & 15 सेंमी. वर्षा में 45 & 70 & 20 & 25 सेंमी. की दूरी पर बुआई करनी चाहिए ।
बुआई का समय
भिंडी के बीज सीधे खेत में ही बोये जाते है। बीज बोने से पहले खेत को तैयार करने के लिये 2-3 बार जुताई करें। पूरे खेत को उचित आकार की पट्टियों में बांट लें जिससे कि सिंचाई करने में सुविधा हो। वर्षा ऋतु में जल निकास की दृष्टि से क्यारियों को तैयार करें।
खाद और उर्वरक
प्रति हेक्टेअर क्षेत्र में लगभग 15-20 टन गोबर की खाद 300 किग्रा. अमोनियम सल्फेट या 400 किग्रा. सुपर फॉस्फेट एवं 100 किग्रा. उत्तमवीर यूरिया 15 दिन के अन्तर पर 2 किश्तों में डालना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में हर 5-7 दिन बाद तथा ऋतु में आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए। गीष्म ऋतु में हर दिन, बाद वर्षा ऋतु में आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए।
निराई व सिंचाई
सिंचाई मार्च में 10-12 दिन, अप्रैल में 7-8 दिन और मई-जून मे 4-5 दिन के अन्तर पर करें। बरसात में यदि बराबर वर्षा होती है तो सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।
पौध संरक्षण
तना, फल छेदक एवं फुदका इसके नियन्त्रण के लिये 100-150 मिली. इमिडावीर प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए। फलों को छिड़काव से पहले तोड़ लेना चाहिए तथा इसके अलावा कीड़ा लगे फलों को तोड़ कर जमीन में गाड़ देना चाहिए। पीत रोग, येलो बेन मौजेक यह भिंडी का प्रमुख रोग है। इस रोग में पत्तियों की शिराएं पीली पडऩे लगती हैं अन्तत: पूरा पौधा एवं फल पीले हो जाते हैं। इस रोग से बचाने के लिये रोगरोधी किस्मों का ही प्रयोग करना चाहिए।
कटाई व उपज
भिंडी की तुड़ाई हर तीसरे या चौथे दिन आवश्यक हो जाती है। तोडऩे में थोडा भी अधिक समय हो जाने पर फल कड़ा हो जाता है। फल को फूल खिलने के 5-7 दिन के भीतर अवश्य तोड़ लेना चाहिए। उचित देखरेख, उचित किस्म व खाद- उर्वरकों के प्रयोग से प्रति हेक्टेअर 130-150 कुन्तल हरी फलियां प्राप्त हो जाती हैं।

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