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Sunday, 21 April 2019

अमीर होकर भी गरीब हैं तिरुपती बालाजी

एक आंकड़े के अनुसार बालाजी मंदिर ट्रस्ट के खजाने में 50 हजार करोड़ से अधिक की संपत्ति है। लेकिन इतने धनवान होने पर भी बालाजी सभी देवताओं से गरीब ही हैं। मान्यता है कि बालाजी कलियुग के अंत तक कर्ज में रहेंगे। बालाजी के ऊपर जो कर्ज है उसी कर्ज को चुकाने के लिए यहां भक्त सोना और बहुमूल्य धातु एवं धन दान करते हैं। शास्त्रों के अनुसार कर्ज में डूबे व्यक्ति के पास कितना भी धन हो वह गरीब ही होता है। इस नियम के अनुसार यह माना जाता है कि धनवान होकर भी गरीब हैं बालाजी। इसके पीछे धारणा यह है कि भगवान विष्णु जब पद्मावती से विवाह की तो उनके पास उन्हें देने के लिए कुछ नहीं था। विष्णु जी ने इस समस्या के समाधान के लिए भगवान शिव और ब्रह्मा जी को साक्षी मानकर कुबेर से काफी धन कर्ज में लिया। इस कर्ज से भगवान विष्णु के वेंकटेश रुप और देवी लक्ष्मी के अंश पद्मवती ने विवाह किया। कुबेर से कर्ज लेते समय भगवान ने वचन दिया था कि कलियुग के अंत तक वह अपना सारा कर्ज चुका देंगे। कर्ज समाप्त होने तक वह सूद चुकाते रहेंगे। भगवान के कर्ज में डूबे होने की इस मान्यता के कारण बड़ी मात्रा में भक्त धन-दौलत भेंट करते हैं ताकि भगवान कर्ज मुक्त हो जाएं।

आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में चमत्कार की ढेरों कहानियां समेटे एवं धन के देवता के रूप में प्रसिद्घ भगवान बालाजी का पवित्र व प्राचीन मंदिर पर्वत की वेंकटाद्रि नामक सातवीं चोटी पर स्थित है, जो श्री स्वामी पुष्करणी नामक तालाब के किनारे है। इसी कारण यहां पर बालाजी को भगवान वेंकटेश्वर के नाम से जाना जाता है। चेन्नई से करीब 130 किलोमीटर दूर तिरुपति रेल-सड़क और वायु मार्ग से जुड़ा है। यह भारत के उन चुनिंदा मंदिरों में से एक है, जिसके पट सभी धर्मानुयायियों के लिए खुले हुए हैं। यही वजह है कि यह स्थान भारत के सबसे अधिक तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केंद्र है। इसके साथ ही इसे विश्व के सर्वाधिक धनी धार्मिक स्थानों में से भी एक माना जाता है। कहते है तिरुपति बालाजी दोनों हाथों से देते हैं धन, बस थोड़ा उनके लिए भी रख दीजिए! तमिल भाषा में तिरु का अर्थ संस्.त के शब्द श्री के समान माता लक्ष्मी के लिए प्रयोग होता है। अत: तिरुपति यानी लक्ष्मीपति। तिरुपति से करीब 22 किलोमीटर की ऊंचाई पर सप्तगिरी पर्वत, शेषनाग के फन की तरह सात पहाडियों की श्रृंखला है। शेषाद्रि, नीलाद्रि, गरुड़ाद्रि, अंजनाद्रि, वृषभाद्रि, नारायणाद्रि और वेंकटाद्रि। सातवीं पहाड़ी वेकटाद्रि पर ही स्थापित है श्री वेंकटेश्वर का विग्रह। इसीलिए इन्हें सात पहाड़ों का भगवान भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय वास्तुकला एवं शिल्प का अद्भुत उदाहरण है यह मंदिर।

मंदिर परिसर में अनेक द्वार और मंडप स्थापित है। मुख्य मंदिर स्वर्ण पतरों से विभूषित है। जिसके गर्भग्रह में भगवान की सात फुट ऊंची श्याम वर्णीय प्रतिमा स्थापित है। भगवान श्री बालाजी अपने हाथ में शंख, पद्म, चक्र और गदा धारण किये हुए हैं। मंदिर प्रांगण में ही माता लक्ष्मी-पद्मावती के साथ विराजमान हैं। उनकी आंखें ढंकी हुई-सी दिखती है…एक हाथ हवा में आशिर्वाद की मुद्रा में है…और दूसरा हाथ कुछ मांग कर लेने की मुद्रा में। यानी बाला जी भक्तों को एक हाथ से धन देते हैं और दूसरे हाथ से अपना हिस्सा मांगते हैं। भगवान के विग्रह पर भीमसेनी कर्पूर का तिलक किया जाता है, जो प्रसाद के रुप में वितरित होता है। भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन से पूर्व स्वामी पुष्करिणी में स्नान कर नये कपड़े धारण करने के पश्चात सरोवर के तट पर बने वराह स्वामी का दर्शन कर नैवेघम चढ़ाना काफी लाभकारी है। कहते हैं इस क्षेत्र के स्वामी वराह थे।

भगवान श्री वेंकेटेश्वर के दर्शन पश्चात हुंडी में केश एवं धन-द्रव्य अर्पण की परंपरा है और यह माना जाता है कि भगवान अपने भक्तों को चढ़ावे से कई गुना अधिक वापसी का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। दर्शन पश्चात भक्तों को प्रसाद के रुप में मीठी पोंगल या दही-चावल प्राप्त होता हैं। वहीं तिरुपति के लड्डू भी अपनी विशिष्टता के लिए प्रसिद्घ है। बेसन, घी और सूखे मेवे से बने लड्डू का पेटेंट भी किया गया है। यहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सबसे बड़ी इच्छा भगवान वैंकटेश्वर के दर्शन करने की होती है। भक्तों की लंबी कतारें देखकर सहज की इस मंदिर की प्रसिद्घि का अनुमान लगाया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक एक लाख से भी अधिक श्रद्घालु इस मंदिर में प्रतिदिन दर्शन के लिए आते हैं।

भक्तों का यह जमावड़ा पूरे वातावरण मन को श्रद्घा और आस्था से भर देता है। एकादशी के अवसर पर यहां श्रद्घालुओं का भारी भीड़ जुटती है। कहते हैं यहां बालाजी के र्दान मात्र से ही न सिर्फ सभी पाप धुल जाते हैं, बल्कि व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति के साथ उन्हें सुख-समृद्घि का आशीर्वाद भी मिल जाता है। इसीलिए भगवान वैंकटेवर को संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी माना जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर की उत्पत्ति वैष्णव संप्रदाय से हुई है। यह संप्रदाय समानता और प्रेम के सिद्घांत को मानता है। इस मंदिर की महिमा का वर्णन विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। माना जाता है कि भगवान वैंकटेश्वर का दर्शन करने वाले हरेक व्यक्ति को उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।

हुंडी में धन-द्रव्य चढ़ाने व केशदान की अनूठी परंपरा

कहा जाता है की इस मंदिर मे वेंकटेश्वर स्वामी की मूर्ति पर लगे हुए बाल असली है। ये कभी भी उलझते नही हैं। हमेशा मुलायम रहते है। लोगों का मानना है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां खुद भगवान बालाजी विराजते हैं। यही वजह है कि केश मुंडन बाला जी की प्रधान मनौती है। प्रतिदिन कम से कम 20 हजार भक्त अपने केश कटवाकर भगवान को समर्पित करते हैं। हर वर्ष 17 से 22 करोड़ रुपए में यह केश बिकता है, जिसकी राशि मंदिर ट्रस्ट को जाता है। कहा जाता है कि जब 18 शताब्दी में मंदिर की दिवार पर ही कुछ लोगों को फांसी दी गयी थी तबसे खुद वेंकटेश्वर स्वामी जी मंदिर में प्रकट होते रहते हैं। इस मंदिर को पूरे 12 वर्षों के लिए बंद कर दिया गया था। क्योंकि उस वक्त वहां के राजा ने कुल 12 लोगो को मौत की सजा दी और उन्हें मंदिर के गेट पर ही लटका दिया।

वो छड़ी, जिजसे बालाजी की हुई पिटाई
मंदिर में भगवान बालाजी की मूर्ति पर अगर कान लगा के सुनेंगे तो आपको समुद्र की आवाज सुनाई देगी। इसी कारण बालाजी की मूर्ति हमेशा नम रहती हैं। मंदिर मे मुख्य द्वार के दरवाजे के दाईं ओर एक छड़ी है। इस छड़ी के बारे मे कहा जाता है की इस छड़ी से बालाजी के बाल रुप मे पिटाई की गई थी जिससे उनकी ठोड़ी में चोट लग गई। तबसे आज तक उनके ठोड़ी पर चंदन का लेप लगाया जाता है, ताकि उनका घाव भर जाए। मंदिर मे एक दिया हमेशा जलता रहता है। इसमें ना कभी तेल डाला जाता ना ही घी। आचर्यजनक यह है कि बालाजी के मूर्ति को गर्भ-गृह से देखेंगे तो भगवान की मूर्ति मंदिर के गर्भ-गृह के मध्य मे स्थित पाएंगे, लेकिन जब इसे बाहर आकर देखेंगे तो मूर्ति मंदिर के दाईं और स्थित है।

भगवान बालाजी की प्रतिमा पर एक खास तरह का पचाई कपूर लगाया जाता है, अगर इसे किसी भी पत्थर पर चढ़ाया जाता हैं तो वो कुछ समय के बाद ही चटक जाता है किन्तु भगवान की प्रतिमा को कुछ नहीं होता है। मंदिर में मूर्ति पर जीतने भी फूल-पत्ती या तुलसी के पत्ते चढ़ाते हैं वो सबके सब भक्तों को ना देकर पीछे उपस्थित एक जलकुंड है उन्हें वही पीछे देखे बिना उनका विसर्जन किया जाता है, क्योंकि पुष्प को देखना और रखना अच्छा नहीं माना जाता है। प्रत्येक गुरुवार को बालाजी की मूर्ति पर चंदन का लेप लगाया जाता है और जब उसे हटाया जाता है तब वहां खुद-ब-खुद ही माता लक्ष्मी की प्रतिमा उभर आती हैं। बालाजी को प्रतिदिन नीचे धोती और उपर साड़ी से सजाया जाता है। खास यह है कि मंदिर से 23 किमी दूर एक गांव है, उस गांव में बाहरी व्यक्ति का प्रवेश निषेध है। वहां पर लोग नियम-संयम से रहते हैं। वहीं से लाए गये फूल एवं दूध, घी, मख्खन समेत अन्य सामाग्रियां भगवान को चढाई जाती है।

पौराणिक मान्यताएं

प्रभु वेंकटेश्वर या बालाजी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि प्रभु विष्णु ने कुछ समय के लिए स्वामी पुष्करणी नामक तालाब के किनारे निवास किया था। यह तालाब तिरुमाला के पास स्थित है। तिरुमाला- तिरुपति के चारों ओर स्थित पहाडिय़ां, शेषनाग के सात फनों के आधार पर बनीं सप्तगिरी कहलाती हैं। श्री वेंकटेश्वरैया का यह मंदिर सप्तगिरि की सातवीं पहाड़ी पर स्थित है, जो वेंकटाद्री नाम से प्रसिद्घ है। यह समुद्र तल से 3200 फीट ऊंचाई पर है। कई शताब्दी पूर्व बना यह मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला और शिल्प कला का अदभूत उदाहरण हैं।

कहते हैं 11वीं शताब्दी में संत रामानुज ने तिरुपति की इस सातवीं पहाड़ी पर चढ़ाई की थी। प्रभु श्रीनिवास (वेंकटेश्वर का दूसरा नाम) उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। ऐसा माना जाता है कि प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात वे 120 वर्ष की आयु तक जीवित रहे और जगह-जगह घूमकर वेंकटेश्वर भगवान की ख्याति फैलाई। कहा जाता है कि एकबार मानव जगत के कल्याण हेतु महायज्ञ का आयोजन किया और इसके फल के लिए उचित देवता की जवाबदारी महार्षि भृगृ को सौंपी गई। ब्रम्हा, विष्ण, महेश में से पात्र चयन की प्रक्रिया में महार्षि भृगृ को ब्रम्हा और महेश ने यथोचित सम्मान नहीं दिया। इसके उपरांत ऋषि भृगृ जब श्री विष्णु के पास पहुंचे तो वे निद्रालीन थे। इससे कुपति होकर भृगृ ऋषि ने उनके वक्ष पर चरण प्रहार कर निद्रा भंग की।

ऋषिवर के आने का कारण प्रभु जानते थे सो उन्होंने विनम्रता से पूछा कि कहीं उनके चरणों में दर्द तो नहीं हुआ। इस विनम्रता से प्रभावित होकर महार्षि भृगृ ने श्री विष्णु को देवों में सर्वश्रेष्ठ और यज्ञफल के लिए योग्य माना। वहीं दूसरी ओर माताश्री लक्ष्मी ऋषि के इस व्यवहार से रुष्ट होकर पृथ्वी लोक गमन कर गई। कहते हैं कि माता लक्ष्मी ने सप्तगिरी में रहने वाले आकाश राजा की पुत्री के रुप में जन्म लिया वहीं दूसरी ओर भगवान श्री विष्णु खोज करते हुए यहां पहुंचे और उन्होंने इस पर्वत श्रृंखला में अपना बहुत समय व्यतीत किया। यहीं उनका विवाह माता पद्मावती से हुआ और उसके बाद उनके बड़े भाई गोविंदराज स्वामी ने यहां इस विग्रह मंदिर का निर्माण किया। तिरुपति का सम्पूर्ण क्षेत्र भगवान विष्णु को वैकुंठ धाम के बाद सबसे ज्यादा प्रिय है। मान्यता है कि बैकुंठ एकादशी को भगवान यहां प्रगट होते हैं और इस दिन पुष्करिणी में स्नान करने और भगवान के दर्शन से मनुष्य के सब पाप धुल जाते हैं। कहते हैं श्री वेंकेटेश्वर ने कुबेर से इस निर्माण हेतु ऋण लिया जिसे भक्तगण अदा करते हैं।

गरुण टोल गेट

बालाजी के दर्शन के लिए गरुड़ टोल गेट को पार करना पड़ता है। तिरुमला का रास्ता यहीं से शुरू होता है। माना जाता है कि गरुड़ जी की इजाजत मिलने के बाद ही विष्णु भगवान रूपी बालाजी का दर्शन होता है। रात 12 बजे से पहले ही गाड़ी वहां जाती है, उसके बाद सुबह के तीन-चार बजे तक गाडिय़ों का प्रवेश वर्जित हो जाता है। वैसे पैदल का रास्ता भी है, जिसके लिए 18 किमी की चढ़ाई चढऩी पड़ती है। पैदल वही लोग जाते हैं, जिन्होंने इसके लिए मन्नत मांगी है और उनकी मन्नत पूरी हुई है।

रास्ते में बालाजी के प्रहरी
तिरुमल चढऩे वाले भक्तों को आशिर्वाद देते हुए खड़े हैं भगवान श्री महागणपति। पहाड़ की तराई में टेढ़े-मेढ़े रास्तों को पार कर भक्त तिरुमला के प्रवेशद्वार पर पहुंचते हैं। यहां प्रवेश करने वालों का स्वागत द्वारपाल जय और विजय हाथ जोड़कर करते हैं। तिरुमला में प्रवेश करते ही विष्णु के महाअवतार श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र में अर्जुन को उपदेश देने की मुद्रा में खड़े हैं। जिन्होंने केश समर्पण किया है वो और जिन्होंने ने नहीं किया है वो भी मंदिर के इस फाटक से प्रवेश करते हैं, जिसे बैकुंठ तोरण कहा जाता है।

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