२०१४ के बाद फिर कुर्मी बनाम निषाद में आमने-सामने का है मुकाबला | Alienture हिन्दी

Breaking

Post Top Ad

X

Post Top Ad

Recommended Post Slide Out For Blogger

Monday, 22 April 2019

२०१४ के बाद फिर कुर्मी बनाम निषाद में आमने-सामने का है मुकाबला

फतेहपुर। तीन बार जिले को नेतृत्व दे चुका कुर्मी समाज इस बार असमंजस की स्थिति में है! सपा-बसपा और रालोद गठबंधन के बाद कांग्रेस द्वारा भी कुर्मी समाज से प्रत्याशी उतार देने के बाद फतेहपुर की राजनीति के द्रस्टिकोड से सवर्ण माना जाने वाला कुर्मी वोटर पशोपेश की स्थिति में दिख रहाँ है, उसकी समस्या अकेले दो सजातीय प्रत्याशी ही नहीं है, सत्तारूढ़ दलो से जुड़े दो स्थानीय विधायक जय कुमार जैकी (राज्य मन्त्री) जहानाबाद व करण सिंह पटेल बिंदकी भी है। इन दोनो विधायकों का राजनैतिक भविष्य भी काफी कुछ अपने सजातीय वोटों पर निर्भर है। ऐसा कहा जा रहाँ है कि जहानाबाद और बिंदकी से अगर भाजपा प्रत्याशी साध्वी को सम्मानजनक वोट जैकी और करण नहीं दिला पाये तो ये उनकी सियासत का भविष्य प्रभावित कर सकती है। इस चुनाव के पूर्व २०१४ में भी कुर्मी और निषाद बिरादरी के मतदाताओं के बीच रोचक मुकाबला हुआ था, उसमें निषाद ने बाजी मारी थी। इस बार दो कद्दावर कर्मियों के आमने सामने होने से मुकाबले में और जान आ गई है। बताते चले कि जहाँ तक सजातीय वोटों का सवाल है, कर्मियों में उनकी उपजातियों को लेकर भी चर्चा तेज है, राकेश और सुखदेव के कार्यालयों में उनसे जुड़ी सजातीय उपजातियो का बाकायदे डाँटा उपलब्ध है, खासकर राकेश सचान के लोग इस पर कुछ ज्यादा गंभीर है, और कैसे भी बाजी मारने की जुगत में है किंतु सुखदेव को भी इस खेल में कही से कमजोर नहीं कहा जा सकता। सुखदेव समर्थक सजातीय लोग राकेश को इस खेल का कच्चा खिलाड़ी मानते है, और राकेश कुछ ज्यादा अतिरिक्त विश्वास में भी कहे जा सकते है!
फतेहपुर संसदीय क्षेत्र में लोकसभा चुनाव की सरगर्मियाँ परवान चढ़ने लगी है। बैकवर्ड आधारित हो चुकी यहाँ की राजनीति में कुर्मी समाज की भूमिका काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। यहाँ से 03 बार कुर्मी सांसद भी हो चुका है। जातिगत गुणा भाग के इस समर में कुर्मी वोटरों का टेस्ट परिवर्तनकारी रहा है। कोई भी निवर्तमान सांसद पराजय के बाद फिर कभी सर्वोच्च सदन का मुँह नहीं देख सका। डा० अशोक पटेल दो बार और राकेश सचान एक बार यहाँ से सांसद जरूर रहे, किन्तु जब हारे तो तीसरे स्थान पर रहे! बिरादरी की सियासी लीक से जो भी हटा कुर्मी मतदाताओं ने फिर उसे सांसद नहीं बनाया। इस बार यहाँ से सपा-बसपा गठबंधन व कांग्रेस ने कुर्मी समाज से प्रत्याशी उतारा है। गठबंधन के सुखदेव प्रसाद वर्मा पूर्व में बिन्दकी विधान सभा चुनाव में करारी शिकस्त से आहत हुए तो कांग्रेस के राकेश सचान पिछले लोस चुनाव में बमुश्किल जमानत बचा पाये थे! राकेश सचान संसदीय इतिहास के पहले बतौर दलीय कुर्मी प्रत्याशी बने है जो दलबदल कर भाग्य आजमा रहे है!
उल्लेखनीय है कि फतेहपुर लोकसभा सीट से प्रमुख दलो ने 11 बार कुर्मी समाज से प्रत्याशी उतारा है, जिनमे सर्वाधिक चार बार भारतीय जनता पार्टी ने व दो-दो बार भारतीय क्रान्ति दल व समाजवादी पार्टी ने व 01 बार बसपा ने तथा पहली बार कांग्रेस इस सीट पर कुर्मी समाज पर विश्वास जताया है। यह भी पहला अवसर है जब यहाँ से दो प्रमुख दलो ने कुर्मी प्रत्याशी उतार कर जोखिम उठाया हैं! संसदीय इतिहास में फतेहपुर सीट पर सर्वप्रथम १९६७ में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली भारतीय क्रान्ति दल ने ब्रजलाल वर्मा को प्रत्याशी बनाया था, किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। बीकेडी ने १९७१ में भी ब्रजलाल वर्मा पर दाँव खेला, किंतु सफलता कोसो दूर रही! उंसके बाद लगभग दो दशक तक यहाँ से कुर्मी प्रत्याशी नहीं हुआ। १९९१ में भारतीय जनता पार्टी ने इस बिरादरी पर विश्वास जताते हुए डा० विजय नारायण सचान को प्रत्याशी बनाया, १९९१ में ही बसपा ने भी यदुनाथ पटेल को प्रत्याशी बनाया था किन्तु सीट नहीं निकल पाई। दलित मजदूर किसान पार्टी ने १९९८ के चुनाव में इस सीट पर अपना दावा ठोकते हुए यहाँ से डा० अशोक पटेल को प्रत्याशी बनाया, ये वो चुनाव था जब भाजपा ने पार्टी का बगैर सदस्य बने अशोक पटेल को अपना सिम्बल दिया था और अशोक पटेल की जीत ने दशकों के संघर्ष के बाद बतौर कुर्मी सांसद यहाँ भाजपा का खाता भी खोला था।
लगभग तेरह माह बाद १९९९ में हुए पुनः संसदीय चुनाव में अशोक पटेल भाजपा के सिम्बल पर चुनाव लड़े और इकलौते कुर्मी सांसद बने जो दूसरी बार भी भाजपा के लिये सीट जीतकर दी, किन्तु २००४ के चुनाव में पराजय के बाद अशोक पटेल का राजनैतिक कैरियर लगभग समाप्त हो गया! लोकसभा चुनाव २००९ में समाजवादी पार्टी ने पहली बार कानपुर के राकेश सचान को बतौर कुर्मी यहाँ से प्रत्याशी बनाया और राकेश पहली बार में ही सपा के लिये यह सीट जीतने में सफल रहे, किंतु २०१४ के चुनाव में बड़े अन्तर से पराजय के साथ तीसरे स्थान पर रहे। बमुश्किल उनकी जमानत बच पाई थी! मौजूदा समय में चल रही लोस चुनाव प्रक्रिया में सपा के साथ बसपा का तालमेल होने से यह सीट बसपा के खाते में गई और बसपा ने भी कुर्मी प्रत्याशी ही चुना। बसपा से बिंदकी के पूर्व विधायक सुखदेव प्रसाद वर्मा को मैदान में उतारा गया है। वही सपा से टिकट कटने के बाद राकेश सचान बगैर देर किये कांग्रेस की गोद में बैठ गये और कांग्रेस से प्रत्याशी भी बना दिये गये। फतेहपुर के संसदीय इतिहास में यह पहला अवसर है जब दो प्रमुख दलो ने एक साथ कुर्मी प्रत्याशी उतारकर बड़ा जोखिम उठाया है। बड़ी बात यह भी है कि दोनो पूर्व में पराजित हो चुके है। एक लोकसभा चुनाव में और दूसरा विधान सभा चुनाव में मात खा चुका है और दोनो ही इस चुनाव में अपने और अपने समाज के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है।

No comments:

Post a Comment

Post Top Ad