विकलांगता/दिव्यांगता से ग्रस्त व्यक्ति को धमकाना या शर्मिंदा करना दण्डनीय अपराध- डॉ.मृगेश


लखनऊ। आनेवाली फिल्म “मेंटल है क्या” का आईएमए ने किया कड़ा विरोध,हालाकिं टाइटल में जो ‘मेंटल’ नामक शब्द है और जो कहने का अन्दाज है वह मानसिक रोग की परेशानियाँ झेल रहे लोगों की हँसी उड़ाता है और उनका अपमान करता है। आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ शांतनु सेन का कहना है कि कई शोध यह बताते हैं भारत सहित दुनिया के सारे देश मानसिक रोगों से जुड़े कलंक (स्टिग्मा) से आज भी जूझ रहे हैं। विशेषज्ञ लोगों को लगातार समझा रहे कि दुनिया में कोई मेंटल या पागल नहीं। वे सब किसी न किसी रोग से ग्रस्त हैं और यह न अपराध है न अभिशाप। इन रोगों का इलाज सम्भव है। कुछ बीमारियाँ क्रॉनिक होती हैं जो कि नियमित दवाओं और अन्य प्रकार की देखभाल से नियंत्रित रहती हैं।
अनैतिक और अमानवीय ही नहीं अवैधानिक भी – डॉ.मृगेश
इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ.मृगेश वैष्णव का कहना है कि मानव-अधिकारों के प्रति सजगता के इस दौर में मानसिक रूप से परेशान लोगों के अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए। अब तो हम पूरे व्यक्ति को बीमार बताने वाले टर्म ‘मानसिक रोगी’ की जगह ‘मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति’ कहने लगे हैं क्योंकि मनोरोग व्यक्ति को पूरी तरह खारिज नहीं करते। मगर इस फिल्म का टाइटल व्यक्ति को पूरी तरह खारिज करता है- यह अनैतिक और अमानवीय ही नहीं अवैधानिक भी है।स्मरण रहे कि राइट ऑफ परसंस विथ डिसएबिलिटी ऐक्ट का सेक्शन 92 कहता है कि किसी भी प्रकार की विकलांगता/दिव्यांगता से ग्रस्त व्यक्ति को धमकाना या खुले आम शर्मिंदा करना दण्डनीय अपराध है और इसके लिए आर्थिक दण्ड सहित छः महीने से पाँच वर्ष तक की सजा हो सकती है।
फिल्म से खतरनाक खेल खेलने की प्रवृति का उदाहरण
फिल्म निर्माता ने हाल ही में एक पोस्टर रिलीज किया है। उसमें नायक और नायिका आमने-सामने बैठकर अपनी सटी हुई जीभों के ऊपर एक नंगे ब्लेड को संतुलित करते दिखते हैं। कमाल की कल्पना है! मगर क्या यह रचनात्मक भी है ? इसकी कौन-सी उपयोगिता है ? सच्चाई तो यह है कि यह एक खतरनाक खेल खेलने की प्रवृति का उदाहरण है।
अपमानजनक टाइटल पर रोक लगाए— डॉ शांतनु सेन
इंडियन मेडिकल असोसिएशन तथा इंडियन साइकाएट्रिक सोसाइटी फिल्म के टाइटल और पोस्टर की भर्त्सना करते हैं और निर्माता से इन्हें वापस लेने की अपील करते हैं। हम यह भी अपील करते हैं कि टाइटल ही नहीं फिल्म के कॉंटेंट (कहानी और चित्रण) में भी सुधार करें अगर वह मानसिक रोग से जूझ रहे नागरिकों का अपमान करने वाला या खतरों से नाहक खेलने की प्रवृति को बढ़ाने वाला है। रचनात्मकता और अभिव्यक्ति की आजादी का तर्क आपको इस बात की छूट नहीं देता कि आप बीमार लोगों और उनके परिजनों को अपमानित करें और युवाओं को जीवन खतरे में डालने केलिए प्रेरित करें। साथ ही सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टीफिकेशन से आग्रह करते हैं कि इस अपमानजनक टाइटल पर रोक लगाए और अगर इस फिल्म में मानसिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से कुछ भी आपत्तिजनक है तो उसे हटाने या परिवर्तित करने का आदेश दे।

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