केरल सरकार ने सालभर में दूसरी बार सिर उठाने वाले निपाह वायरस पर पूरी तरह काबू पा लिया है, जबकि बिहार में चमकी बुखार (एईएस) से बच्चों की मौत का आंकड़ा 179 को पार कर चुका है। केरल की तरह बिहार ने भी संक्रामक से निपटने के तरीकों को अपनाया होता तो इतने मासूम दम नहीं तोड़ते। उम्मीद जगाते केरल के तरीकों पर नजर डालती एक रिपोर्ट
केरल में थी तैयारी
निपाह वायरस के पहले हमले के बाद से ही केरल सरकार पूरी तरह तैयार हो गई थी। स्वास्थ्य महकमे के अफसरों ने निगरानी के लिए पहले से ही कुशल लोगों की टीम बना रखी थी। यही वजह है कि एर्नाकुलम में निपाह से संक्रमण का केवल एक मामला समने आया, लेकिन किसी की मौत नहीं हुई।
अनुमान और तत्परता
केरल ने दिखाया कि किसी बीमारी को रोकने में उसके आने का पहले से अनुमान लगाना और तत्पर होना महत्वपूर्ण है। सेवनिवृत्त अतिरिक्त मुख्य सचिव (स्वास्थ्य) राजीव सदानंदन ने छह महीने पहले ही निपाह के दोबारा हमले की आशंका जताकर आगाह कर दिया था। निपाह से संक्रमण की सूचना मिलते ही स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा बीच रास्ते से एर्नाकुलम पहुंची जहां मरीज भर्ती था।
सघन जांच
केरल ने आपसी सहयोग के लिए इतना मजबूत नेटवर्क बनाया कि इस साल निपाह से संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले सभी 300 लोगों की कई बार जांच की गई। हर संदिग्ध मरीजों का नमूना भेजा गया। इससे फायदा यह हुआ कि एक और खतरनाक ‘वेस्ट निले वायरस’ की मौजूदगी के बारे में भी पता चल गया।
स्थानीय जांच व्यवस्था
निपाह से संक्रमित व्यक्ति की जांच के लिए केरल सरकार नमूने को पहले पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) भेजती थी। इससे रिपोर्ट मिलने में 24 से 36 घंटे की देरी होती थी। प्रभावी इलाज को सुनिश्चित करने के लिए केरल ने संक्रमण प्रभावित जिले एर्नाकुलम में प्रयोगशाला स्थापित कर दी, जिसके कारण महज तीन-चार घंटे में रिपोर्ट मिलने लगी।

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