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Tuesday, 24 October 2017

पंचायत का फैसला: जिस घर में शौचालय नहीं, वहां शादी नहीं

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाग़पत में बिजवाड़ा गांव की पंचायत ने शौचालय संबंधी औरतों की तकलीफ़ को समझते हुए एक फ़ैसला लिया है. फ़ैसला ये है कि जिस घर में शौचालय नहीं होगा, वहां शादी नहीं होगी.
ये शर्त लड़के और लड़की दोनों की शादी के लिए होगी. यानि जिस घर में शौचालय नहीं होगा, वहां से न तो बहू लाएंगे और न ही वहां बेटी की शादी करेंगे.
गांव के प्रधान अरविंद से इस बावत बात की और पूछा तो उन्होंने बताया कि ”हमने शनिवार को पंचायती सर्वसमाज की बैठक की और हमें लगा कि बहू-बेटियों की इज्ज़त के लिए शौचालय होना ज़रूरी है. गांव-देहात में औरतें शाम होने के बाद शौच के लिए नहीं जा पातीं.”
क्या गांव की किसी लड़की के साथ हुई अनहोनी ने पंचायत को ये फ़ैसला लेने पर मजबूर किया?
इस सवाल के जवाब में अरविंद ने कहा, ”कोई अनहोनी तो नहीं हुई, लेकिन कई औरतों को नहर के किनारे शौच के लिए जाना पड़ता है जहां पर किसानों का आना-जाना रहता है. ऐसे में औरतों के लिए बड़ी शर्मिंदगी वाली स्थिति हो जाती है इसलिए हमने ये फ़ैसला लिया.”
उन्होंने बताया कि गांव में तक़रीबन 1000-1200 लड़कियां हैं जिनकी शादी मुज़फ़्फरनगर और शामली ज़िले के गांवों में होती है और वहां के कुछ 20-25% घरों में अब भी शौचालय नहीं है.
मुज़फ़्फरनगर और शामली पर फ़ैसले का असर
तो क्या बागपत पंचायत के फ़ैसले के बाद मुज़फ़्फरनगर और शामली जिले के लड़के कुंवारे रह जाएंगे. इस पर शामली ज़िले के बाबरी गांव के प्रधान आनंद पाल से बात की. उनके मुताबिक उनके गांव में 180 घरों में शौचालय नहीं था लेकिन ज़िला प्रशासन को चिट्ठी लिख कर अनुदान मांगा है. अब समस्या 40 घरों की है. वहां भी जल्द टॉयलेट बनावा लिए जाएंगे.”
मुज़फ़्फरनगर के लूसाना गांव के प्रधान अनिल ने बताया कि “फ़ैसला सही है. हमारे यहां लड़कों की शादी में दिक्कत नहीं आएगी क्योंकि 1000 में से 60 घरों में ही अब शौचालय नहीं है. वहां भी हम शौचालय बनवा रहे है. कुछ गांव में इस फैसले के बाद शादी न होने की समस्या हो सकती है.”
क्या सोचते हैं स्थानीय लोग?
बागपत ज़िले के हिलवाड़ी गांव की अंजलि कहती हैं,”हमें खुशी है कि पंचायत औरतों के बारे में सोच रही है. खेतों में शौच करने से गंदगी फैलती है और बीमारियां होती हैं. पंचायत को गरीब लोगों के लिए शौचालय बनाने में मदद भी करनी चाहिए.”
सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में शौचालय बनवाने के लिए 10,28,541 अर्जियां मिली थीं. इनमें से 2,72,822 बन चुके हैं या इन पर काम शुरू हो गया है. यानि अब भी लगभग 8 लाख टॉयलट बनाए जाने बाकी हैं.
बावली गांव के रहने वाले सुरेंद्र पवार का कहना है कि शौचालय न होने से सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं को ही होती है इसलिए यह पहल अच्छी है.
हालांकि सुरेंद्र ये भी मानते हैं कि बिना शौचालय वाले घरों में शादी न करने का फ़ैसला कुछ ज्यादा ही सख़्त है. उन्होंने कहा,”कई बार लोगों की मजबूरियां होती हैं इसलिए बेहतर ये होगा कि जिसके घर में शौचालय नहीं है वहां मिलकर शौचालय बनवाया जाए.”
इस पर ग्राम प्रधान अरविंद ने कहा कि वो गरीब तबके के लोगों की आर्थिक मदद करने के लिए भी तैयार हैं.
अरविंद से पूछा कि क्या उनकी इस पहल के पीछे स्थानीय प्रशासन का भी हाथ है? इसके जवाब में उन्होंने बताया कि यह पूरी तरह से गांव के लोगों और पंचायत का फ़ैसला है और इसके ज़रिए उन्होंने ‘स्वच्छ भारत मिशन’ को आगे ले जाने की कोशिश की है.
लोगों की राय
बिजवाड़ा गांव की पायल कहती हैं, “पंचायत के फैसले के पहले ही मैंने ये फैसला कर लिया था, वहीं शादी करुंगी जहां शौचालय होगा.”
मलकपुर गांव की ऋतिका कहतीं हैं, “एक तरफ तो बड़े बूढ़े कहते हैं लड़कियों को पर्दा करना चाहिए, दूसरी तरफ घर पर लड़कियों के लिए टॉयलेट नहीं होता. कम ये कम इस फैसले के बाद टॉयलेट बनेंगे तो.”
हालात कितने खराब हैं, इसका अंदाजा भारत सरकार के स्वच्छता मिशन रिपोर्ट के आंकड़ों पर नज़र डालने से पता चलता है.
रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण भारत में अब भी 52.1% लोग खुल में शौच करने जाते हैं यानि भारत के गांवों की आधे से अधिक आबादी खुले में शौच के लिए जाती है. शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 7.5 फ़ीसदी है.
-BBC

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