पुणे। ’शिखरजी बचाओ’ आंदोलन जोर पकड़ रहा है। इस आंदोलन का मकसद पारसनाथ पहाड़ की पवित्रता की रक्षा करना है। पारसनाथ पहाड़ को ही जैन मुनि शिखरजी कहते हैं। आंदोलनकारियों ने शिखजी को ’उपासना स्थल’ घोषित करने की मांग की है। इस आंदोलन में जुटे लोग जैनियों का पवित्र तीर्थस्थल पारसनाथ को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने से नाराज हैं। उनका कहना है कि वहां पर्यटन को बढ़ावा देने से मांस-मदिरा व अन्य अवांछित चीजों का प्रचलन हो जाएगा जो जैन-धर्म में निषेध है।
दरअसल, आंदोलनकारी जैन धर्मावलंबी लोग ही हैं। आंदोलन जैनाचार्य विजय युगभूषण सूरीजी (पंडित महाराज) के मार्गदर्शन में चल रहा है और इस अभियान का संचालन ’ज्योत’ नामक लाभ-निरपेक्ष संगठन द्वारा किया जा रहा है।
संगठन की ओर से एक विज्ञप्ति में बताया गया कि सबसे पावन जैन तीर्थ ’शिखरजी’, पारसनाथ पर्वत को ही कहा जाता है जिसकी पवित्रता की रक्षा के लिए जैनियों का यह संयुक्त प्रयास है।
इस अभियान के विषय में आचार्य जी ने कहा, “समृद्ध धर्म और सांस्कृतिक धरोहर ही भारत को बाकी संसार से अलग करती हैं। शिखरजी जैसा महातीर्थ भारत की आध्यात्मिक संपदा का प्रतीक है। ऐसे स्थलों की शुद्धता को नष्ट करना हमारे राष्ट्र के गौरव के साथ खिलवाड़ करने से कम नहीं है।“
उन्होंने कहा, “आज पारसनाथ पर्वत के क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने के सरकारी इरादे के कारण शिखरजी की पवित्रता नष्ट होने का खतरा बना है। मदिरा मांस और दूसरे अवगुण को पर्यटन के साथ पहुचते ही इस तीर्थस्थल की पवित्रता नष्ट कर देंगे और जैनियों की आस्था तथा मान्यताओं पर चोट करेंगे।“
उन्होंने कहा कि सभी जानते हैं कि जैन अनुयायी शिखरजी की यात्रा नंगे पैर करते हैं और इसकी पवित्रता बहाल रखने के लिए पर्वत पर भोजन और जल ग्रहण का त्याग करते है। आचार्य ने कहा कि जैन धर्म मूल रूप से धार्मिक संपदा के व्यवसायीकरण और मनोरंजक उपयोग से मना करता है।
संगठन ने विज्ञप्ति में बताया कि एक महीने पहले शुरू हुआ यह आन्दोलन जोर पकड़ रहा है और अब तक पूरे विश्व में समस्त जैन समुदाय को जाग्रत कर चुका है।
संगठन ने कहा, “जैन धर्मावलंबियों के समर्थन पत्र अमेरिका, कनाडा और न्यूजीलैंड के संगठनों से लगातार मिल रहे हैं और यह तब तक जारी रहेगा जब तक कि सरकार आधिकारिक तौर पर सम्पूर्ण पर्वत को ’उपासना स्थल’ घोषित नहीं कर देती। दुनिया भर में विस्तृत जैन समुदाय के लोग इस लक्ष्य के प्रति एकजुट हुए हैं, क्योंकि जैन धर्म के सभी चार पंथों-श्वेताम्बर, दिगंबर, तेरापंथी और स्थानकवासी- के प्रमुख संत एकजुट हैं।“
संगठन के अनुसार, शिखरजी गिरिराज 20 र्तीथकरों की निर्वाण भूमि होने के कारण जैनियों का पूजा स्थल और आस्था का शीर्ष प्रतीक है और अन्य अनगिनत मुनियों- महंतों ने पहाड़ पर साधना करके मोक्ष प्राप्त किया है।

No comments:
Post a Comment