एक वक्त था जब वो मैदान पर किक मारता था, लेकिन अब सालों से वो खुद खाना तक नहीं खा पाता, अंगों को हिला तक नहीं पाता। मैंने तो पूरी उम्मीद छोड़ दी थी, ख्याल से ही निकाल दिया था कि मेरा बेटा कभी ठीक भी हो सकता है। ये अफ्रीका से भारत अपने बेटे के इलाज के लिए आए पिता का दर्द है। जी हां लाइबेरिया के रहने वाले 15 साल के मोहम्मद इब्राहीम मोरिंगा और उसके पिता ने जीने की उम्मीद ही छोड़ दी थी लेकिन भारत में आकर जिंदगी की लौ फिर से जलने लगी। दिल्ली के धर्मशिला नारायणा सुपरस्पेशियलिटी हॉस्पिटल ने इब्राहीम को नइ जिंदगी दे दी।
4 साल की उम्र में आखिरीबार मैदान में फुटबॉल खेला था इब्राहीम। उसके बाद से अब तक (आज वो 15 साल का हो गया) यानी 11 साल तक उसकी जिंदगी रुकी हुई थी क्योंकि उसे सिकल सेल एनीमिया जैसी बीमारी हो गई थी। इस बीमारी में शरीर की लाल रक्त कोशिकाएं असामान्य हो जाती हैं। रोगी के शरीर में पानी की कमी के कारण यह असामान्य कोशिकाएं धमनियों में रुकावट पैदा करने लगती है और रक्त के प्रवाह को बंद कर देती हैं।
इसी कारण साल 2008 में इब्राहीम को मस्तिष्क में स्ट्रोक हुआ, और उसके शरीर के अंगों में शिथिलता आने लगी। हाथ- पैर काम करना बंद करने लगे। पैरों से शुरू हूई कमजोरी धीरे- धीरे शरीर के ऊपरी अंगों में भी होने लगी और इब्राहीम बिस्तर पर कब आ गया उसे खुद नहीं पता चला। सालों उसका इलाज चला, विदेश में कइ शहरों में लेकिन कोइ सुधार नहीं हुआ। इब्राहीम की जिंदगी दूसरे के ऊपर निर्भर होने लगी। लेकिन इब्राहीम के पिता ने हार नहीं मानी और उसे भारत ले आए।
लम्बे समय तक ये शिथिलता रहने के कारण इब्राहीम की मांसपेशियों में काम करने की क्षमता समाप्त होने लगी। इब्राहीम की यह अवस्था मांसपेशियों में जकड़न के कारण हुई थी, जो असामान्य तंत्रिका नियंत्रण से होता है। इस अवस्था में आने से पहले अपने स्कूल में फुटबॉल खेलने वाला इब्राहीम अब अपने हाथ से एक निवाला खाने में भी असमर्थ हो गया था। इब्राहीम के पिता जो कि लाइबेरिया के एक राजनयिक है, अपने बेटे को इस हाल में देखकर बेहद दुखी थे।
हॉस्पिटल के डॉक्टर आशीष श्रीवास्तव – एचओडी एंड सीनियर कंसलटेंट, न्यूरो सर्जरी डिपार्टमेंट और डॉक्टर अभिनव गुप्ता, सीनियर कंसलटेंट, न्यूरो सर्जरी, बताते है कि हमने उसका इलाज बैक्लोफेन नामक दवाई से शुरू किया, जो कि जकड़न ( स्पास्टिसिटी) को कम करती है। बैक्लोफेन के 25 माइक्रोग्राम का एक इंजेक्शन रीढ़ कि हड्डी के रास्ते मस्तिष्क में बहने वाले पानी ( सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुइड) में दिया गया।
इस दवाई के पश्चात इब्राहीम अपने हाथ से कुछ खाने में सक्षम हो गया । वह ग्यारह साल के बाद अपने हाथों और पैरों से काम ले पाया। बैक्लोफेन की सफलता को देखते हुए डॉक्टरों ने इब्राहीम की रीढ़ में एक दवा वितरण पंप डाला जिससे बैक्लोफेन की अत्यंत छोटी मात्रा को निरंतर सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड में भेजा जा सके।
क्या होती है ये बीमारी और भारत में क्या है हाल
सिकल सेल रोग या SCD खून से जुड़ी एक बीमारी है, जो बच्चे में अपने माता या पिता या दोनों से आनुवंशिक रूप से आती है। इस बीमारी में खून में पर्याप्त संख्या में लाल रक्त कोशिकाएं (आरबीसी/ रेड ब्लड सैल्स) नहीं होती, जो शरीर में ऑक्सीजन ले जाने के लिए जरूरी हैं। आमतौर पर यह बीमारी अफ्रीका, अरब और भारतीय प्रायद्वीप में पाई जाती है। लेकिन अब भारत में भी ये बीमारी पाइ जाने लगी है।
विश्व की जनसंख्या में पांच प्रतिशत लोग सिकल सेल रोग के वाहक हैं। विश्व में 3 लाख बच्चे प्रतिवर्ष सिकल सेल विकृति के साथ पैदा होते हैं। विश्व के सिकल सेल के आधे मरीज भारत के छत्तीसगढ़ में हैं।

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