ब्रह्माजी के सृष्टि सृजन का पर्व है नवरात्र | Alienture हिन्दी

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Saturday, 6 April 2019

ब्रह्माजी के सृष्टि सृजन का पर्व है नवरात्र

नवरात्र शब्द से नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध होता है। इस समय शक्ति के नौ रुपों की उपासना की जाती है, क्योंकि रात्रि शब्द सिद्घि का प्रतीक माना जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से चैत्र नवरात्र का विशेष महत्व है, क्योंकि इस नवरात्र की अवधि में सूर्य का राशि परिवर्तन होता है। सूर्य 12 राशियों में भ्रमण पूरा करते हैं और फिर से अगला चक्र पूरा करने के लिए पहली राशि मेष में प्रवेश करते हैं। सूर्य और मंगल की राशि मेष दोनों ही अग्नि तत्ववाले हैं, इसलिए इनके संयोग से गर्मी की शुरुआत होती है। या यूं कहे नवरात्र वह समय है, जब दोनों रितुओं का मिलन होता है। इस संधि काल मे ब्रह्मांड से असीम शक्तियां ऊर्जा के रुप में हम तक पहुँचती हैं। मुख्य रूप से हम दो नवरात्रों के विषय में जानते हैं – चैत्र नवरात्र एवं आश्विन नवरात्र। चैत्र नवरात्रि गर्मियों के मौसम की शुरूआत करता है और प्रकृति मां एक प्रमुख जलवायु परिवर्तन से गुजरती है। यह लोकप्रिय धारणा है कि चैत्र नवरात्र के दौरान एक उपवास का पालन करने से शरीर आगामी गर्मियों के मौसम के लिए तैयार होता है। इसमें माँ भगवती के सभी नौ रूपों की उपासना की जाती है। इस समय आध्यात्मिक ऊर्जा ग्रहण करने के लिए लोग विशिष्ट अनुष्ठान करते हैं। इस अनुष्ठान में देवी के रूपों की साधना की जाती है।

पुराण और ग्रंथों के अनुसार चैत्र नवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण नवरात्रि है जिसमें देवी शक्ति की पूजा की जाती थी। रामायण के अनुसार भी भगवान राम ने चैत्र के महीने में देवी दुर्गा की उपासना कर रावण का वध कर विजय प्राप्त की थी। इसीलिए चैत्र नवरात्रि पूरे भारत में खासकर उत्तरी राज्यों में धूमधाम के साथ मनाई जाती है। हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बहुत लोकप्रिय है। महाराष्ट्र राज्य में यह गुड़ी पड़वा के साथ शुरू होती है, जबकि आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों में, यह उत्सव उगादी से शुरू होता है। धार्मिक दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है, क्योंकि ब्रह्मपुराण के अनुसार नवरात्र के पहले दिन आदिशक्ति प्रकट हुई थीं और देवी के कहने पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सूर्योदय के समय ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण का काम शुरू किया था, इसलिए इसे सृष्टि के निर्माण का उत्सव भी कहा जाता है।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि संपूर्ण सृष्टि प्रकृतिमय है और हम जिसे पुरुष रूप में देखते हैं, वह भी आध्यात्मिक दृष्टि से प्रकृति यानी स्त्री रूप है। स्त्री से यहां तात्पर्य यह है कि जो पाने की इच्छा रखनेवाला है, वह स्त्री है और जो इच्छा की पूर्ति करता है, वह पुरुष है। इस बार चैत्र नवरात्र 6 अप्रैल से शुरू हो रहा हैं। इस साल नवरात्र में कोई तिथि क्षय नहीं है। यानी इस बार चैत्र नवरात्र पूरे 9 दिन के होंगे। साथ ही इस साल नवरात्र में कई शुभ योग भी बन रहे हैं। इस साल चैत्र नवरात्र पर माँ दुर्गा 6 अप्रैल 2019 शनिवार के दिन अश्व (घोड़े) पर सवार होकर आ रही हैं। इस शुभ संयोग के अलावा ज्योतिषीय नजरिए से देखा जाए तो नवरात्र में पुष्य योग, सर्वार्थसिद्घि और रवियोग भी बन रहे हैं। इस कारण ये 9 दिन बहुत ही खास रहेंगे।

ज्योतिषियों के अनुसार, इस बार नवरात्र में पांच सर्वार्थ सिद्घि, दो रवि योग और रवि पुष्य योग का संयोग बन रहा है। श्रीमद् देवी भागवत व देवी ग्रंथों के अनुसार इस तरह के संयोग कम ही बनते हैं। इसलिए यह नवरात्र देवी साधकों के लिए खास रहेगी। नवरात्र का समापन 14 अप्रैल को होगा। श्रीराम नवमी स्मार्त मतानुसार 13 अप्रैल को रहेगी। इस दिन सुबह 11.48 बजे तक अष्टमी है और इसके बाद नवमी शुरू हो जाएगी। इस मत में मध्याह्न व्यापिनी नवमी को श्रीराम नवमी मानते हैं। जबकि वैष्णव मत में उदयकाल की तिथि मानी जाती है। 14 अप्रैल को सुबह 9.27 बजे तक नवमी होने से इस मत के लोग 14 अप्रैल को नवमी मनाएंगे। इस तिथि को वर्ष प्रतिपदा और युगादि भी कहा जाता है। इस दिन हिंदू नववर्ष का प्रारंभ हुआ था। ब्रह्म पुराण के अनुसार इस दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का सृजन किया था। इसलिए इस दिन नया संवत्सर शुंरू होता है। अत: इस तिथि को नवसंवत्सर भी कहते हैं। कहते हैं यह पंचांग राजा विक्रमादित्य के शासनकाल से ही जारी हुआ था, इसी कारण इसे विक्रम संवत् नाम से जाना जाता है। इस दिन लोग नवीन वस्त्र पहनते हैं, घरों की सफाई कर उसे सुसज्जित करते हैं, रंगोली सजाकर द्वार पर आम्रपत्र से लरी बना कर द्वार सजाते हैं।

चैतीचंद्र महोत्सव
आदिकाल से ही न केवल मनुष्य, बल्कि ईश्वर भी आद्याशक्ति की उपासना करते रहे हैं। देवी स्वरुप में ऊषा की स्तुति ऋग्वेद में तीन सौ बार करने का उल्लेख है। शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि की रचना के साथ नौ दिनों तक आद्याशक्ति मां भगवती की आराधना का नवरात्र उत्सव प्रारंभ होता है। नवरात्रि के प्रथम दिन, नव संवत्सर की प्रथम रात्रि का चैत्र शुक्ल प्रथम दर्शन ही चैत्र चंद्र दर्शन है, जिसे उत्सव रूप में मनाया जाता है। इसे ही चैतीचंद्र महोत्सव कहा जाता है। इस दिन झूलेलाल और मातारानी की आराधना की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीराम ने अत्याचारी शासक बाली का वध कर किष्किंधा की प्रजा को मुक्ति दिलायी थी। बाली के अत्याचार से मुक्त हो प्रजा इसी दिन विजय ध्वज फहराकर उत्सव के आनंद के साथ झूम उठी थी। इस दिन नयी साड़ी पहनाकर बांस में तांबे या पीतल का लोटा और आम्र पल्लव रखकर गुड़ी बनायी जाती एवं उसका और श्रीराम-हनुमानजी की पूजा किये जाने का विधान है। द्वापर काल मवारिका में रहने वाले प्रसेनजीत की हत्या के कलंक से कलंकित श्रीकृष्ण जब मणि का पता लगाने हेतू अंधेरी गुफा में प्रवेश किये, तब समस्त ब्रजवासियों ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ कर चौत्र शुक्ल नवमी तक सोपवास माता भगवती की आराधना की एवं रात्रि जागरण किया था, ताकि श्री कृष्ण गुफा से सकुशल लौट आएं, नव संवत्सर के दिन प्रात: पंचांग की पूजा करके वर्षफल का श्रवण किया जाता है।

पूजन विधि

नवरात्र उपासक कक्ष की पूर्व दिशा की ओर गोबर लीपकर माता भगवती को स्थापित कर मिट्टी की वेदी बनाकर कलश रखते हैं। विधिवत गेहूं, जौ आदि धान्य बोते हैं। श्री गौरी, गणपति, नवग्रह आदि की पूजा कर भगवती मां अम्बा की फल-फूलों से पूजा करते हैं। प्राचीन काल में ऋतु और राशि परिवर्तन के ऐसे समय में स्वयं को स्वस्थ एवं निरोग रखने के लिए लोग सोपवास मां भगवती की आराधना करते थे। सात्विक आहार, व्रत-उपवास से शरीर और मन दोनों को शुद्घ करने का सशक्त उपक्रम है चैत्र नवरात्रि।

नारी शक्ति का बोलबाला होगा
इस संवत् को परिधावी भी कहा जा रहा है। संवत् 2076 के राजा शनि और मंत्री सूर्य होंगे। शनि के राजा पद पर विराजने से राजनीति में विचित्र स्थितियां निर्मित होंगी। आध्यात्मिक प्रवृत्ति का विस्तार होगा। शनि के राजा होने से आध्यात्म और योग के प्रसार में इजाफा होगा। नारी शक्ति का बोलबाला होगा। सुखेश पद पर शुक्र के होने से स्त्रियों की सफलता में वृद्घि होगी। नारी शक्ति की उपलब्धियों का चहुंओर बोलबाला होगा। धान्येश के पद पर चंद्रमा के आसीन होने से सरसों, ज्वार, बाजरा, गेहूं और चावल की फसल अच्छी रहेगी। दूध उत्पादन में वृद्घि होगी। मेघेश पद पर शनि के आसीन होने से नेताओं को सक्रिय रहना होगा, जनता जवाब मांगेगी।

नेताओं की पेशानी पर बल पड़ेंगे। दवाओं पर खर्च बढ़ेगा। जनता बेचैन रहेगी। शनि के मारकेश होने से दुर्घटनाओं से हानि हो सकती है। उत्तर, पूर्व और उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में भूकंप की आशंका है। पूर्व व दक्षिणी हिस्सों में प्र.तिक आपदा से क्षति हो सकती है। वैशाख से ज्येष्ठ माह के मध्य पश्चिमी राष्ट्रों में बेचौनी नजर आएगी। रसेश शुक्र के कारण फलों, फूलों, पर्फ्यूम्स और डिजाइनर वस्त्रों का कारोबार अच्छा रहेगा। बुध के नीरशेष होने से अजीब-अजीब फैशन प्रचलन में आएगा। फलेश शनि के कारण सब्जियां महंगी होंगी। लोगों की जेब पर इस साल जरा दबाव बढ़ेगा। क्रय क्षमता में विस्तार इस वर्ष भी नहीं होगा। निवेश में लाभ हाथ में आकर फिसलता नजर आएगा। बाजार के लिए 2019 का साल कोई विशेष राहत देने वाला नहीं है।

नए संवत् 2076 यानी प्रमादी में सूर्य के मंत्री होने से अनाज की पैदावार में वृद्घि, कुछ व्यापारियों को खूब लाभ मिलेगा लेकिन लूटपाट से कष्ट होगा। शुक्र के आयेश होने से सौंदर्य प्रसाधन का व्यापार बढ़ेगा। रोमांटिक फिल्मों को बड़ी सफलता मिलेगी। चांदी में मामूली गिरावट के बाद तेजी दर्ज होगी। इस साल ही नहीं, अगले कई वर्षों तक चांदी चुपके से लाभ दिलाएगी। वस्त्रों के कारोबार में तेजी आएगी। ‘आर्थिक धोखाधड़ी और फंसाने वाले स्कीम का बोलबाला होगा। बड़े व्यापारियों की गर्दन कानूनी शिकंजे में फंसेगी। ढेरों बड़ी कंपनियां दिवालियेपन की कगार पर कराहती नजर आएंगी। व्यापारी कानूनी शिकंजों और एजेंसियों  में छटपटाते दिखाई देंगे। कई जीवनभर की पूंजी लुटाने के करीब दिखाई देंगे। कारोबारियों की मुश्किलें इस बरस के आरंभ में जस की तस रहेंगी। कई बड़े बिल्डर परिस्थितियों के मारे नजर आएंगे और कानून के कोड़े खाएंगे। शेयर बाजार में कुछ गिरावट का योग दृष्टिगोचर हो रहा है। गिरावट के पश्चात बाजार में चढ़ाव साफ नजर आएगा। अचानक से पश्चिमी देशों के बाजारों में गिरावट से भारत के बाजारों पर भी कुछ समय के लिए काले बादल उमड़ते नजर आएंगे। म्यूचुअल फंड की कुछ इजाफा के बाद गिरावट दर्ज होगी। सरकारी बैंकों के शेयरों के भाव में वृद्घि संभव है।

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
चैत्र नवरात्र को लेकर मान्यता है कि पौराणिक कथा और शुभ मुहूर्त में माता के कलश की स्थापना की जाए तो घर में सुख और समृद्घि बनी रहती है। इस बार कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सिर्फ 4 घंटे 10 मिनट तक ही रहेगा। कलश स्थापना मुहूर्त सुबह 06 बजकर 09 मिनट से लेकर 10 बजकर 21 मिनट तक रहेगा।

मां के नौ रूपों की पूजा
सनातन संस्कृति के संदर्भ में नवरात्रि को आदिशक्ति की साधना का सर्वश्रेष्ठ कालखंड माना जाता है। देवीसूक्त में आदिशक्ति नवदुर्गा के नौ रूपों की उपासना का विशद वर्णन मिलता है। नवरात्रि पर्व व्यक्ति को यम, नियम, व्रत-उपवास के द्वारा उसकी सूक्ष्म और स्थूल कर्मेंद्रियों की शुचिता, आत्मानुशासन एवं परिशोधन के लिए विशेष अवसर प्रदान करने का पर्व है। नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री का होता है। पहले दिन घी का भोग लगाएं और दान करें। इससे रोगी को कष्टों से मुक्ति मिलती है और बीमारी दूर होती है। दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी का होता है।

माता को शक्कर का भोग लगाएं और उसका दान करें। इससे आयु लंबी होती है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। मां को दूध चढ़ाएं और इसका दान करें। ऐसा करने से सभी तरह के दु:खों से मुक्ति मिलती है। चौथे दिन मां कुष्मांडा की अराधना होती है। माता को मालपुए का भोग लगाएं और दान करें। इससे सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति व सुख की प्राप्ति होती है। पांचवें दिन मां स्कंदमाता का है। मां को केले व शहद का भोग लगाएं व दान करें। इससे परिवार में सुख-शांति रहेगी और शहद के भोग से धन प्राप्ति के योग बनते हैं। छठे दिन मां कात्यानी की पूजा की जाती है। षष्ठी तिथि के दिन प्रसाद में मधु यानि शहद का प्रयोग करना चाहिए। इसके प्रभाव से साधक सुंदर रुप प्राप्त करता है। सातवां दिन मां कालरात्रि को पूजा जाता है। मां को गुड़ की चीजों का भोग लगाकर दान करने से गरीबी दूर हो जाती है। अष्टमी के दिन महागौरी यानि मां दुर्गा को समर्पित है। माता को नारियल का भोग लगाकर दान करना चाहिए, ऐसा कहा जाता है कि इससे सुख-समृद्घि की प्राप्ति होती है। नवमी पर सिद्घदात्रि की पूजा की जाती है। मां को विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाएं और फिर उसे गरीबों को दान करें।

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