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Friday, 10 May 2019

जुमे की नमाज के इन नियमों को जरूर मानें, पूरी होगी हर दुआ

हर शुक्रवार जुमे की नमाज होती है और इस नमाज को हर मुस्लमान करता है। सप्ताह के एक दिन होने वाली इस नमाज को लेकर नमाजी उत्साहित भी होते हैं। कई लोग सप्ताह के अन्य दिन नमाज नहीं पढ़ पाते या पांचों पहर की नमाज नहीं पढ़ने वालों के लिए शुक्रवार की नमाज बहुत महत्व रखती है। ऐसा माना जाता है कि शुक्रवार की नमाज पढ़ने वाले की एक हफ्ते के दौरान हुई भूल या गलतियों को इससे माफी मिल जाती है। शुक्रवार की नमाज यानी जुमे की नमाज को रहम की नमाज इसलिए ही कहा गया है। लेकिन इस नमाज को पूरा करने के तीन नियम हैं और उसके बिना ये नमाज पूरी मानी भी नहीं जाती।

गुसल, इत्र और सिवाक
अल्लाह से अपनी गल्तियों के माफी के लिए जुमे के दिन नमाज पढ़ने से पहले तीन नियम होते हैं। गुसल, इत्र और सिवाक ये तीन नियमों के पालन के बाद ही जुमे की नमाज से खुदा की इबादत करनी चाहिए। जुमे के दिन को अल्लाह के दरबार में रहम का दिन माना गया है और इस रहम को पाने के लिए ही नमाज पढ़ी जाती है। वैसे तो इस्लाम में हर दिन पांच बार नमाज पढ़ी जाती है, लेकिन जो हर दिन नमाज के लिए वक्त नहीं निकाल पाते, वो हर शुक्रवार मस्जिद जाकर अल्लाह की इबादत जरूर करते हैं, लेकिन शुक्रवार का ही दिन क्यों महत्वपूर्ण होता है और ये तीन नियम को विस्तार से जानते हैं।

जुमे की नमाज पढ़ने के लिए तीन नियम गुसल, इत्र और सिवाक हैं। पहले नियम के तहत गुसल का मतलब है कि शुक्रवार के दिन नहाना जरूरी है। नहा कर शरीर को पाक करना और फिर जुमे के नमाज के लिए खुद को तैयार करना। दूसरा नियम है इत्र का अगर आप नहा कर इत्र लगाए बिना नमाज अता करेंगे तो वह कबूल नहीं होगी। इत्र लगाना जुमे की नमाज का जरूरी नियम है। तीसरा है सिवाक यानी दांतों को साफ कराना।

क्यों होती है शुक्रवार को जुमे की नमाज
अब जानते हैं कि शुक्रवार को ही क्यों होती है जुमे की नमाज। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि स्वयं अल्लाह ने ही शुक्रवार का दिन इस नमाज के लिए चुना था। हफ्ते के सभी दिनों की तुलना में उन्होंने ही शुक्रवार के दिन को सर्वश्रेष्ठ माना था। रमजान के महीने के लिए भी स्वयं अल्लाह ने ही साल में एक महीना रमजान के लिए तय किया है। इस्लामिक मान्यता है कि शुक्रवार के ही दिन अल्लाह ने ‘आदम’ को बनाया गया था और इसी दिन आदम की मृत्यु भी हुई ।

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