मध्य पूर्व का क्षेत्र एक बड़े संकट की तरफ कदम बढ़ाने लगा है. जानकार इस क्षेत्र को आने वाले वक्त में एक ख़तरनाक दौर से गुजरता हुआ देख रहे हैं.
कथित इस्लामिक स्टेट के धीरे-धीरे समाप्ति की राह पकड़ने के बाद, अब सऊदी अरब और ईरान एक-दूसरे के आमने-सामने हैं और यही संकट पूरे मध्यपूर्व क्षेत्र को घेरने के लिए तैयार दिख रहा है. सऊदी और ईरान के बीच संघर्ष में लेबनान केंद्र बिंदु बना हुआ है.
यहां के प्रधानमंत्री साद हरीरी ने कुछ दिन पहले ही सऊदी अरब दौरे के बीच में अप्रत्याशित रूप से इस्तीफ़ा दे दिया था. उनके इस्तीफ़े का असर पूरे क्षेत्र में दिखाई पड़ रहा है. बेरूत स्थित बीबीसी संवाददाता मार्टिन पेशेंस के अनुसार लेबनान के अधिकतर नागरिकों का मानना है कि हरीरी ने सऊदी के दबाव में आकर इस्तीफ़ा दिया है.
सऊदी-ईरान का संघर्ष
फिलहाल तो यह भी जानकारी नहीं है कि हरीरी कब तक लेबनान लौटेंगे. हालांकि लेबनानी राष्ट्रपति मिशेल आउन और अन्य वरिष्ठ राजनेताओं ने उनसे वापस आने की अपील की है. लेबनान में इस बात की आशंका जताई जा रही है कि हरीरी को सऊदी अरब में नज़रबंद कर रखा है और उनसे ज़बरन इस्तीफ़ा दिलवाया गया है.
आउन ने अभी तक हरीरी का इस्तीफ़ा मंजूर नहीं किया है. हरीरी ने टीवी पर अपने इस्तीफे की घोषणा करने के बाद से सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं बोला है. इस पूरे घटनाक्रम को सुन्नी नेतृत्व वाले सऊदी अरब और शिया प्रभुत्व वाले ईरान के बीच जारी संघर्ष के रूप में देखा जा रहा है.
ताक़तवर हिज़्बुल्ला शिया आंदोलन को ईरान का समर्थन प्राप्त है, जोकि लेबनान और इस इलाक़े में तनाव बढ़ाने के लिए सऊदी अरब को ज़िम्मेदार ठहराता रहा है. लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री और हरीरी के पिता रफीक अल-हरीरी की हत्या 2005 में एक कार बम धमाके में हुई थी, इस धमाके के लिए हिज़्बुल्ला को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता है.
हिज़्बुल्ला की ताकत
शिया समुदाय के प्रमुख नेता हसन नसरल्लाह ने शुक्रवार को कहा था कि सऊदी अरब ने लेबनान के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी है. हिज़्बुल्ला पर आरोप हैं कि उसने लेबनान के अंदर अपना एक अलग राज्य स्थापित कर दिया है.
हिज़्बुल्ला की सेना लेनबानी सेना से ज्यादा ताक़तवर है और उसके नेताओं का वहां की कैबिनेट पर ख़ासा असर है. गुरुवार को सऊदी अरब और उसके सहयोगी खाड़ी देशों ने लेबनान के नागरिकों को अपना इलाका छोड़कर चले जाने की बात कही, इसके बाद लेबनान समेत पूरे इलाके में तनाव पैदा हो गया.
हिज़्बुल्ला के समाचार पत्र अल अखबर के संपादक हसन इलीक कहते हैं, “अमरीका, इसराइल और सऊदी मिलकर हिज़्बुल्ला को सीरिया और इराक़ में फायदा उठाने से रोकना चाहते हैं.”
ये माना जाता है कि बशर अल-असद को सत्ता में बनाए रखने के लिए ईरान और हिज़्बुल्ला की सेनाओं का समर्थन जरूरी है.
सीरिया में लड़ाई
इलीक कहते हैं, “यमन में जो हालात हैं ठीक वही हालात लेबनान के हैं, हिज़्बुल्ला और उसके सहयोगियों को बड़ी कामयाबी तो हाथ लगी, लेकिन अब वे दबाव की स्थिति में हैं.”
बासिन शाद लेबनान की एक राजनीतिक पार्टी से जुड़े हैं, उनकी पार्टी को सऊदी समर्थन हासिल है.
बासिन शाद कहते हैं, “सीरिया में लड़ाई खत्म होने की कगार पर है, वहां सरकार का पलड़ा भारी है और ऐसे में लेबनान के कुछ लोग कह रहे हैं कि उन्होंने जो मदद की उसके बदले में उन्हें भी कुछ मिले.” पिछले हफ्ते यमन से दागी गई ईरान निर्मित मिसाइल के लिए सऊदी अरब ने हिज़्बुल्ला को ज़िम्मेदार ठहराया है.
लेबनान में बड़े राष्ट्रों का हस्तक्षेप कोई नया नहीं है, लेकिन एक गलत कदम यहां के हालात गंभीर बना सकता है. मध्य पूर्व में कार्नेगी सेंटर के थिंक टैंक की निदेशक माहा याह्या कहती हैं, “पिछले कुछ दशकों से इस तरह के हालात नहीं दिखे थे. सचमुच क्षेत्रीय लड़ाई का ख़तरा बन गया है, जिसमें कई देश शामिल हो सकते हैं.”
लेबनान बरसों तक एक शांत देश रहा लेकिन अब वह खुद को एक तूफान में घिरा हुआ पा रहा है.
यही वजह है कि लेबनान पर सभी देशों की नज़र बनी हुई है और यह क्षेत्र पूरे मध्य पूर्व के लिए महत्वपूर्ण बन गया है.
सऊदी अरब और ईरान के बीच बढ़ता टकराव पूरे मध्य पूर्व के लिए एक ख़तरा बन गया है. यह ख़तरा इस्लामिक स्टेट से भी ज़्यादा बड़ा हो सकता है.
-BBC
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