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Friday, 18 January 2019

पाप का धुंध धोएगा कुम्भ

जिस गंगाजल में खुद को साफ करने की क्षमता है, जिस गंगा जल के पान मात्र से मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा होती है उसी गंगा के तट पर जहां यमुना और नजर न आने वाली सरस्वती का त्रिवेणी संगम होता है वहीं, आस्था के समारोह का प्रारम्भ हो रहा है। गंगा तट पर शहर बस गया है। आस्था के उस नगर में न तो भाषा की पाबंदियां हैं और न ऊंच-नीच का भेद। क्या साधु-संत, क्या आम-खास सभी के दिल में एक ही अभिलाषा है कि कब वह त्रिवेणी में डुबकी लगा पाएंगे।
सबसे बड़ी मानव सभा। विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक मेला। पुण्य प्राप्त करने का माध्यम। एक महीने तक कल्पवास के जरिए शरीर व आत्मा दोनों को शुद्ध करने का अवसर। न कोई बुलावा, न आमंत्रण। प्रयाग की महत्ता इतनी कि हर वर्ष संगम किनारे पूरे एक माह तक जन समुद्र खुद-ब-खुद खिंचा चला आता है। मान्यता है कि 36 करोड़ देवी-देवता भी इस दौरान यहीं पर वास करते हैं। राज हठ के कारण सिर्फ एक बार इस मेला पर दाग लग गया, वरना कभी कोई परेशानी किसी को नहीं हुई। 1954 में मना करने के बावजूद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के आने के कारण बख्शी बांध पर मची भगदड़ में हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं की मौत के बावजूद इस मेले पर कोई असर नहीं हुआ। साल दल साल श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है। गंगा-यमुना में अपना पानी आना बंद हो गया, लेकिन श्रद्धालुओं का प्रवाह नहीं थमा।

कुम्भ नगरी की छटा निराली है। न जाति का बंधन। न धर्म का। भाषा का नहीं। और भेष का भी नहीं। हरि को भजे, सो हरि का होई… को चरितार्थ करते हुए विश्व के 144 देशों के लोगों की जुटान इस बात की साक्षी है कि विज्ञान चाहे जितना भी सिर चढ़कर बोले, भारतीय अध्यात्म की महत्ता कभी कम नहीं होगी। इस आयोजन की महत्ता का अंदाज इसी से लगता है कि उत्तर-प्रदेश सरकार सभी विभाग का पूरा अमला इसकी तैयारी में एक वर्ष से ज्यादा समय से लगा है। हजार करोड़ रुपए के आस-पास का सिर्फ सरकारी खर्च है। फिर भी तैयारी मुकम्मल नहीं हो सकी, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। श्रद्धालु आएंगे, कुछ महीने भर कल्पवास करेंगे। कुछ प्रमुख स्नान पर्वों पर ही पुण्य की डुबकी लगाकर चले जाएंगे, लेकिन यहां विभिन्न संस्कृतियों का जो संगम होता है, वह अटूट होता है। अगल-बगल टेंट लगाकर रहने वाले लोग हों, या दिन में तीनों बार स्नान करने का साथ हो, लोग जिंदगी भर याद रखते हैं। कुछ लोग हर वर्ष सिर्फ एक महीने के दोस्तों से ही मिलने आते हैं।

कुम्भ नगरी की दिव्यता दूर से ही महसूस होने लगती है। सरकारी विभाग हों या स्वयंसेवी संस्थाएं। इलाहाबाद व आस-पास के आम लोग भी। सभी यहां आने वाले श्रद्धालुओं में देवत्व महसूस करते हैं। यही कारण है कि इनकी सेवा करने की होड़ मची रहती है। अपराधी भी सेवक बन जाते हैं। विश्व की इस सबसे बड़ी मानव सभा में हर जीव के कल्याण की बातें होती हैं। नारे लगते हैं विश्व का कल्याण हो, अधर्म का नाश हो। वास्तव में मेला भर अधर्म का नाश हो ही जाता है। आंकड़े बताते हैं कि सारी पुलिस मेला क्षेत्र में लगाए जाने के बावजूद इलाहाबाद शहर व जिले में इस एक माह के दौरान अपराध नहीं के बराबर हुए हैं। अगर एक बार की घटना को छोड़ दें तो आम तौर पर भगदड़ भी नहीं होती। लोग आराम से निश्चित मार्गों से घाट तक जाते हैं। डुबकी लगाने के बाद उसी तरह से शांत मुद्रा में अपने शिविर में लौट आते हैं। फाफामऊ से लेकर नैनी तक। झूंसी से लगायत दारागंज तक। इस दायरे में पूरा संसार सिमट गया है। तरह-तरह के लोग। इसमें राजसी ठाट-बाट वाले संत हैं तो औघड़ भी। नागा साधु आए हैं। गंगा को बचाने की आवाज बुलंद करने वाले भी। इस लौकिक आयोजन में अलौकिक आनंद का कारण श्रद्धा ही है।

श्रद्धा यह कि न दिखाई देने के बावजूद लोग मानते हैं कि गंगा, यमुना के साथ सरस्वती नदी का भी संगम यहां हुआ है। आम दिनों में भी संगम किनारे की रेत पर जुड़वां पैरों के निशान दिखाई देते हैं। ये जुड़वां पैर उन जोड़ों के होते हैं, जो यहां गंगा, यमुना और सरस्वती की तरह से एक दूसरे में समा जाने की इच्छा रखते हैं। लौकिक नहीं, अलौकिक आनंद में डूब जाना चाहते हैं। इसी आनंद की चाह में माघ मेला के दौरान करोड़ों लोग संगम किनारे पहुंचते हैं तो माहौल अपने आप दिव्य व अलौकिक हो जाता है। दूर देश से आए परिंदे भी इसका महत्व समझते हैं। वह श्रद्धालुओं को छू लेना चाहते हैं। देखकर इठलाते हैं, इतराते हैं। कभी सिर पर बैठ जाएंगे तो कभी हाथ पर। कभी शरीर को रगड़ते हुए चले जाते हैं। जानकार बताते हैं कि पक्षी ऐसा इसलिए करते हैं कि वह यहां आने वाले लोगों को छू कर पुण्य कमाना चाहते हैं। इस बार का कुम्भ इस लिहाज से भी महत्व रखता है कि यहां सिर्फ धर्म व अध्यात्म की बातें नहीं होंगी। भारत की आत्मा गंगा को बचाने की बात होगी। देश से भ्रष्टाचार का खात्मा करने की बात होगी। लोगों में बढ़ रही आसुरी प्रवृत्तियों के विनाश की बात होगी। इसकी शुरुआत गत वर्ष ही हो चुकी है। प्रयाग के धर्मगुरुओं ने घोषणा कर दी थी कि कुम्भ नगरी में ढोंगी बाबाओं को प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। इस तरह की घोषणा पहली बार हुई। इसका असर भी देखने को मिला है। जिन बाबाओं पर सवाल उठे हैं, उनके आचरण की निंदा हुई है, वह कुम्भ में आने का साहस नहीं दिखा सके। महिलाओं को अधिकार देने की क्रांतिकारी शुरुआत भी इस बार के कुम्भ में हो गई। पहली बार महिला साध्वियों को पेशवाई के साथ ही अपनी धर्मध्वजा फहराने का अवसर मिला है। यह मौका उस सनातन धर्म की सर्वोच्च संस्था जूना अखाड़े ने दिया है, जिसमें कहा गया है-

यत्र नारी पूज्यंते, तत्र रमंते देवता॥

बात तो हो रही है महिला पुरोहितों से पूजा कराने की भी। इसकी तैयारी हो रही है।

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