सुरेश गांधी
वैसे भी कुंभ मानवता का सबसे बड़ा अयात्मिक और सांस्कृतिक समागम है। मानवता का ये संगम अलौकिक आयात्मिक और सांस्कृतिक घटना को लेकर जाना जाएगा। यूनेस्को ने इस आयोजन को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की संज्ञा दी है। दुनिया के 71 देशों के राजदूत ने इस आयोजन में उपस्थित होकर अपने अपने देशों के राष्ट्र वज को यहां स्थापित किया है। इसे वैश्विक मान्यता दी है। इस वक्त प्रयागराज में 71 देशों का वज लहरा रहा है। ये घटना प्रयागराज कुंभ को मिले वैश्विक समर्थन का प्रतीक है। प्रयागराज में संगम के तट पर इन दिनों माहौल भक्तिमय हो चुका है। कुंभ के मेले में देश-विदेश से आ रहे साधु-संत और आमजन यहां डेरा डाल चुके हैं। संगम तट पर स्थित अक्षयवट लोगों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। संगम तट से यमुना किनारे बने किले की ओर देखने पर डालियों से घना वृक्ष नजर आता है। यही वृक्ष अक्षयवट है। इसी वृक्ष के समीप सरस्वती कूप है।
कहा जाता है कि यह से सरस्वती नदी जाकर गंगा-यमुना में मिलती थी। पौराणिक मान्यता है कि धरती पर प्रलय आने पर भी अक्षयवट को क्षति नहीं पहुंची। प्रयाग महात्म्य, पद्म व स्कंद पुराण में अक्षयवट के दर्शन को मोक्ष का माध्यम बताया गया है। यह भगवान विष्णु का साक्षात विग्रह माना जाता है। यही कारण है कि सनातन धर्म में यह सबसे पवित्र व पूज्यनीय वृक्ष है। कहते है इस पेड़ पर चढ़कर लोग मोक्ष की कामना और पाप से मुक्ति के लिए यमुना नदी में कूद कर जान दे देते थे। इस परंपरा पर अकबर ने रोक लगा दी थी। इसके बाद यह किला बंद कर दिया गया। लेकिन अब महाकुंभ के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 450 साल से बंद किले को खोल दिया है। इस अक्षय वट वृक्ष के दर्शन-पूजन के लिए कुंभ नहाने आएं श्रद्घालुओं का जमघट लगा रहता है।
ब्रिटिश काल में यह किला अंग्रेजों के अधीन रहा। स्वतंत्रता के बाद किले की देखरेख सेना कर रही है। यहां सेना का आयुश सेंटर है। सेना के पुजारी ही पूजा-अर्चना करते हैं। आम लोगों के दर्शन के लिए लंबे समय से मांग उठाई जा रही थी। पिछले दिनों मोदी ने अक्षय वट और सरस्वती कूप आम श्रद्घालुओं को खोलने पर सहमति जताई थी। संगम तट से यमुना किनारे बने किले की ओर देखने पर डालियों से घना वृक्ष नजर आता है। यही वृक्ष अक्षयवट है। यह अनादिकाल से यमुना तट पर स्थित है। पौराणिक मान्यता है कि धरती पर प्रलय आने पर भी अक्षयवट को क्षति नह पहुंची। प्रयाग महात्म्य, पद्म व स्कंद पुराण में अक्षयवट के दर्शन को मोक्ष का माध्यम बताया गया है। यह भगवान विष्णु का साक्षात विग्रह माना जाता है। यही कारण है कि सनातन धर्म में यह सबसे पवित्र व पूज्यनीय वृक्ष है।
पौराणिक मान्यताएं
कहते है प्रलय और सृष्टि का साक्षी, प्रयाग की पहचान है अक्षयवट। लेकिन पीढिय़ों से अक्षयवट किले में बंद था। इस बार यहां आने वाला हर श्रद्घालु प्रयागराज की त्रिवेणी में स्नान करने के बाद अक्षयवट के दर्शन-पूजन कर रहा है। इतना ही नहीं, सरस्वती कूप दर्शन भी संभव हो पा रहा था। अक्षयवट अपनी गहरी जड़ों की वजह से बार-बार पल्लवित होकर हमें भी जीवन के प्रति ऐसा ही जीवट रवैया अपनाने की प्रेरणा देता है। अभी तक ओडी किला में बंद अक्षयवट का दर्शन सिर्फ रसूखदार लोगों को मिलता था। सेना के अधिकारियों से जिसकी पहचान होती थी वही अंदर तक पहुंच पाता था। सुरक्षा का हवाला देकर आम श्रद्घालुओं को वहां जाने से रोका जाता था। अकबर ने यमुना किनारे किला बनवाने के लिए 1574 में नीव रखी। किला बनने में 42 साल लग गए। नीव रखने के बाद से अक्षयवट के दर्शन-पूजन का सिलसिला बंद कर दिया गया। वहां लोगों के आवागमन को रोककर किले का निर्माण कराया गया। मुगल शासनकाल के बाद अंग्रेजी हुकूमत में भी अक्षयवट के दर्शन पर पाबंदी थी। अंग्रेजों ने किले को कब्जे में लेकर अपनी छावनी बना ली थी। जहां हथियार बनाए जाते थे। इससे आम लोगों का किले के अंदर प्रवेश करना तो दूर यमुना नदी में किले के पास से नाव में गुजरने पर भी पाबंदी थी। देश को आजादी मिलने के बाद अक्षयवट को आम श्रद्घालुओं के दर्शन के लिए खोलने के लिए समय-समय पर मांग उठती रही है, लेकिन सेना के होने के चलते उसे नहीं खोला गया। कहते है मुगल शासकों ने अक्षयवट का अस्तित्व समाप्त करने का काफी प्रयत्न किया। ङ्क्षहदुओं की धाॢमक मान्यता व भावना को चोट पहुंचाने के लिए अक्षयवट को 23 बार काटा व जलाया गया, लेकिन उसे नष्ट करने में विफल रहे। काटने व जलाने के चंद माह बाद वह पुन: पुराने स्वरुप में आ जाता। इससे हारकर अक्षयवट को बंद करने का निर्णय हुआ, जिसके लिए विशाल घेरा बनाया गया, उसमें किसी को जाने की अनुमति नहीे थी। तब से अक्षयवट कैद था।
सरस्वती कूप
ऐसा कहा जाता है कि एक बार भगवान ब्रह्मा जी सरस्वती जी पर मोहित हो गए थे। इसके बाद मां सरस्वती धरती में समा गई थीं। इसके बाद प्रयागराज के नगर देवता भगवान वेणी माधव ने मां सरस्वती की आराधना की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर ही मां सरस्वती ने इस कूप से निकलकर वेणी माधव को दर्शन दिए। बाद में वेणी माधव ने मां सरस्वती से प्रार्थना की कि गंगा और यमुना नदियां श्रद्घा और भक्ति के रुप में विद्यमान हैं, आप भी यहां पर ज्ञान की देवी के रुप में सदा के लिए विराजमान हों। अक्षयवट की तरह किले में बंद सरस्वती कूप का दर्शन भी श्रद्घालु कर सकेंगे। सरस्वती कूप पृथ्वी के सबसे पवित्रतम् कूप (कुआं) है। मान्यता है कि संगम जो अदृश्य सरस्वती हैं उनका वास इसी कूप में है। बताते हैं कि मत्स्य पुराण में सरस्वती कूप की महिमा बखानी गई है। जैसे गंगा जी गंगोत्री और यमुना जी यमुनोत्री से निकली हैं। इसी प्रकार उत्तराखंड के बद्रीनाथ के पास माणा गांव के ऊपर पवर्तीय क्षेत्र से सरस्वती नदी निकली हैं। पांडव इसी नदी को पार करके स्वर्गलोक की सीढ़ी चढऩे गए थे। वहां आज भी भीम शिला रखी है। प्राचीनकाल में सरस्वती नदी प्रयाग आती थी, लेकिन सदियों पहले लुप्त हो गईं। यमुना तट पर बने कुआं में आज भी उनका जल है। सरस्वती कूप का दर्शन मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
अक्षयवट में भगवान विष्णु बालरुप में करते हैं शयन
बताते हैं कि अक्षयवट पृथ्वी का सबसे प्राचीन वृक्ष है। भागवत पुराण में कहा गया है कि अक्षयवट में भगवान विष्णु बालरुप में शयन करते हैं। यह न सिर्फ प्रयाग बल्कि पूरी धरती के प्रहरी माने जाते हैं। धरती पर प्रलय आने पर भी इसकी क्षति नहीं होगी। वह बताते हैं कि प्रयाग महात्म्य, पद्म व स्कंद पुराण में अक्षयवट के दर्शन को मोक्ष का माध्यम बताया गया है। यह भगवान विष्णु का साक्षात विग्रह है। पद्म पुराण में अक्षयवट को तीर्थराज प्रयाग का छत्र कहा गया है। अक्षयवट का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में भी मिलता है। वनवास के लिए निकले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जब प्रयाग में महॢष भारद्वाज के पास आए तो उन्होंने यमुना तट पर स्थित अक्षयवट की महिमा बताई। इसके बाद श्रीराम, सीता व लक्ष्मण ने अक्षयवट का दर्शन किया था। माता सीता ने अक्षयवट का पूजन कर आशीर्वाद पाने को याचना की थी। रामचरित मानस में वॢणत है-पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हर्षङ्क्षह गाता। अक्षयवट यानी जो अक्षय है, जिसका कभी क्षय नही हो सकता। पौराणिक कथाओं में है कि जब संत मार्कंडेय ने भगवान नारायण से अपनी ईश्वरीय शक्ति दिखाने का आग्रह किया था तो क्षण भर के लिए उन्होंने सारे संसार को जलमग्न कर दिया। उस समय पृथ्वी की सारी वस्तुएं जल में समा गई। लेकिन प्रयाग में स्थित अक्षयवट का ऊपरी भाग दिखाई दे रहा था। बताते हैं कि गुप्तकाल में कालीदास द्वारा रचित रघुवंश में प्रयाग में यमुना के दक्षिण तट पर श्याम नामक वटवृक्ष का उल्लेख है। यही उल्लेख हमें आठव शताब्दी में भवभूति द्वारा रचित उत्तररामचरित में भी मिलता है। जबकि 573 ई. के स्वामीराज के नगरान ताम्र लेख से भी संगम के निकट एक वटवृक्ष की पुष्टि होती है। वह 644 ई. में चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण में अक्षयवट का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार 1030 ई. के अलबरुनी के विवरण में प्रयाग के वृक्ष के रुप में अक्षयवट की महिमा बखानी गई है। जबकि 11वीं शताब्दी के मध्य में महमूद गरदीजी संगम के निकट एक विशाल बातू (वट) का उल्लेख करता है।

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