मरीजों में बढ़ा दवा प्रतिरोधक का खतरा

लखनऊ। सरकारी अस्पताल व डाट्स सेंटर में टीबी की मुफ्त जांच व दवाएं मरीजों को उपलब्ध कराने का भले ही दावा किया जा रहा हो लेकिन मरीजों को पूरी दवाएं तक नहीं मिल पा रही हैं। वहीं छह से दो साल चलने वाला टीबी का कोर्स भी बदहाल होता जा रहा है। दवाओं के लिए मरीज अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं। इसके बाद भी उनकी सुनवाई नहीं हो रही।
लखनऊ में करीब साढ़े छह हजार हैं टीबी मरीज

यूपी में टीबी के पांच लाख 21 हजार मरीज पंजीकृत हैं। मल्टी ड्रग रजिस्टेंस (एमडीआर) के 17 हजार पांच सौ मरीज हैं। एक हजार एक्सडीआर श्रेणी के मरीज हैं। लखनऊ में टीबी मरीजों का आंकड़ करीब साढ़े छह हजार है। एमडीआर के 60 मरीज हैं।
टीबी मरीजों को सरकारी अस्पताल व डाट्स सेंटर में पूरी दवाएं नहीं मिल रही हैं। आधी-अधूरी दवाएं देकर लौटाया जा रहा है। ऐसे में मरीजों में दवा प्रतिरोधक का खतरा बढ़ गया है। गरीब मरीज बाजार से दवाएं खरीदने को मजबूर हैं। शिकायत के बाद भी दवाओं की व्यवस्था में सुधार की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
कई सेंटरों पर दवाओं का संकट
मरीजों को लिवोफ्लॉक्सासिन डॉट्स सेंटर से लेकर टीबी यूनिट तक नहीं मिल रही है। इसके अलावा साइक्लोसिरिन, इफयोनामाइट, क्लोफासिमिन समेत आदि दवाओं का कई सेंटरों पर संकट है। हालात यह है कि आठ से नौ दवाओं में चार से छह तरह की दवाएं ही मिल रही हैं। इस संबंध में स्टेट टीबी ऑफिसर डॉ. संतोष गुप्ता से बात करने की कोशिश की गई लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया।

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