शिशु नियोनैटल कंजक्टिवाइटिस का हो सकते शिकार— डॉ. सिंह
लखनऊ। आजकल बच्चों में आँखों से सम्बंधित समस्या बढ़ रही है अभिभावकों को शिशु की आंख के रंग पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए बल्कि आंख की छोटी से छोटी विषमता का पता लगने पर तुरंत नेत्र विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए।, अभिभावकों को शिशु की आंखों के रंग पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि शिशु की आंख की हर बारीकी पर गौर करना चाहिए, ताकि उसकी आंख की छोटी से छोटी विषमता को भी पहचाना जा सके। जन्म के समय में ही आंख में किसी प्रकार की गड़बड़ी का पता चलते ही नेत्र विशेषज्ञ के पास जाएं। नवजात शिशुओं की आंखों में संक्रमण कोई असाधरण बात नहीं है। पैदा होने से लेकर तीन सप्ताह तक शिशु नियोनैटल कंजक्टिवाइटिस का शिकार हो सकता है। इसके लक्षण स्वरूप शिशु की आंख लाल रहती है और निरंतर पानी निकलता रहता है। इस संक्रमण को नेत्र विशेषज्ञ द्वारा दी गई एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से ठीक किया जा सकता है।
आंख से पानी आने का मतलब संक्रमण
नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइट के निदेशक डॉ. महिपाल सिंह सचदेव का कहना शिशु के जन्म के बाद लगभग चार सप्ताह तक बच्चों की आंख में आंसू कम बनतेे हैं इसलिए आंख से किसी भी प्रकार का पानी आना आसाधरण और हानिकारक होता है। जन्म के समय आंख से पानी आने का मतलब संक्रमण होता है, लेकिन शिशु के तीन महीने या उससे अधिक के हो जाने पर ऐसे लक्षणों का उभरना आंसू-प्रणाली का रूक जाना माना जाता है। अगर यह पानी निकलना 3-4 महीनों तक ठीक न हो तो एक प्रक्रिया के दौरान टियर डक्ट को खोला जाता है। लेकिन उपचार में देरी करने से आगे चलकर बड़ी शल्य प्रक्रिया करानी पड़ सकती है।
बच्चों में रेटिनोपैथी आफ प्रीमैज्युरिटी होने का खतरा अधिक
डॉ. महिपाल सिंह सचदेव का कहना है कि का कहना है कि समय से पहले जन्मे बच्चों में आर ओ पी या रेटिनोपैथी आफ प्रीमैज्युरिटी होने का खतरा अधिक होता है। यह ऐसा विकार है जो कि दोनों आंखों को कुप्रभावित कर अंधा बना सकता है। खासकर वे शिशु, जो समय से पहले पैदा हो जाते हैं या जिनका वजन कम होता है, इससे प्रभावित होते है. दरअसल, गर्भावस्था के आखिरी बारह सप्ताहों में आंखें तेजी से विकसित होती हैं।

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