अक्षय तृतीया : जागेगा सोया भाग्य | Alienture हिन्दी

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Saturday, 4 May 2019

अक्षय तृतीया : जागेगा सोया भाग्य

इस वर्ष सभी प्रकार के कार्यों के लिए अबूझ मुहूर्त और स्नान, दान की पावन तिथि वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया यानी अक्षय तृतीया 7 मई को होगी। तृतीया तिथि इस दिन सुबह 3 बजकर 17 मिनट से लगेगी और दिवस पर्यंत रहेगी। रोहिणी नक्षत्र शाम 4.26 तक और वृष का चंद्रमा भी रहेगा। ङ्क्षहदू पंचांग गणना के अनुसार 16 साल बाद अक्षय तृतीया पर चार बड़े ग्रहों का शुभ संयोग बन रहा है। ऐसा योग बेहद दुर्लभ होता है। इससे पहले यह संयोग वर्ष 2003 में बना था। ज्योतिषियों के अनुसार अक्षय तृतीया पर चार बड़े ग्रह सूर्य, शुक्र, चंद्र और राहू अपनी उच्च राशि में होंगे। इसे बेहद शुभ माना गया है। इसके साथ ही कई अन्य शुभ संयोग भी आखातीज के दिन बन रहे हैं। इस बार रवि, अतिगण्ड योग और राज योग भी रहेंगे।

जिनकी राशि से इन दिनों कोई मुहूर्त नह हो वे अक्षय तृतीया पर विवाह व शुभ कार्य सकते हैं। न केवल मांगलिक कार्य में अपितु किसी भी वस्तु की खरीदारी भी शुभ रहेगी। सभी तरह के कामों के लिए अबूझ मुहूर्त और स्नान, दान की पावन तिथि वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया को रोहिणी नक्षत्र रहेगा और वृष के चंद्रमा में मनाई जाएगी। सतयुग और त्रेतायुग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ था। इस दिन भगवान श्री गणेश जी और माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना की जाती है। अक्षय तृतीय के दिन भगवान शिव शंकर ने कुबेर को धन दिया था। इसलिए इस दिन दान-पुण्य करने से धन और वैभव में बढ़ोतरी होती है। इस दिन अन्न दान करने से अकाल मृत्यु टल जाती है। देवताओं व पूर्वजों की आराधना से दरिद्रता का नाश होता है।

मिलता है अक्षय फल

मान्यता है कि अक्षय तृतीय पर किया गया स्नान, दान, जप, हवन आदि करने पर इसका अक्षय फल मिलता है। इस दिन अपने पूर्वजों की याद में ठंडे जल से भरे मटके प्याऊ में रखवाने और शीतल चीजों के दान का विशेष महत्व बताया गया है। आखातीज के दिन ही ङ्क्षहदुओं के पवित्र चारधाम तीर्थयात्रा के बद्रीनाथ और केदारनाथ के कपाट भी खुलेंगे। माना जाता है कि इस दिन ही सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ हुआ था। इस दिन भगवान परशुराम का अवतरण भी हुआ था। इस दिन भगवान गणेशजी एवं माता लक्ष्मी के पूजन का भी विाान है। कुछ लोग तो इस दिन महालक्ष्मी मंदिर में जाकर धन प्राप्ति की कामना से चारों दिशाओं में सिक्के उछालने की परंपरा भी निभाते हैं।

माना जाता है कि कन्या दान सभी दानों में उत्तम होता है। इसलिए अक्षय तृतीय पर विवाह के विशेष आयोजन होते हैं और वर वधु का जीवन अक्षय रहता है। अक्षय तृतीय पर सोन चांदी के आभूषण खरीदने से घर में बरकत होती है। इस दिन माता लक्ष्मी की चरण पादुकाएं लाकर घर में रखना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इस दिन किए जाने वाला दान- पुण्य का भी कभी क्षय नह होता। इस लिए सभी को इस दौरान दान- पुण्य करना चाहिए। जिसमें साधु संतों के साथ ब्राह्मणों व गरीबों को भोजन कराकर व वस्त्र दान करने के साथ गायों को हरा चारा खिलाना चाहिए। जिससे विशेष लाभ मिलता है और भगवान विष्णु की कृपा अपने भक्तों पर हमेशा बनी रहती है।

पूजा व खरीदारी के लिए शुभ घड़ी

अक्षय तृतीय का प्रारंभ 7 मई को तड़के 3:12 बजे होगा। तृतीय तिथि 8 मई को दोपहर 2:17 बजे तक रहेगी। अक्षय तृतीय पर पूजा अर्चना का मुहूर्त सुबह 5:40 बजे से दोपहर 12:13 बजे तक रहेगी। सोना – चांदी खरीदारी का मुहूर्त शाम 5:40 बजे से देर रात्रि तक रहेगा।

पूजा व खरीदारी के लिए शुभ घड़ी

अक्षय तृतीय का प्रारंभ 7 मई को तड़के 3:12 बजे होगा। तृतीय तिथि 8 मई को दोपहर 2:17 बजे तक रहेगी। अक्षय तृतीय पर पूजा अर्चना का मुहूर्त सुबह 5:40 बजे से दोपहर 12:13 बजे तक रहेगी। सोना – चांदी खरीदारी का मुहूर्त शाम 5:40 बजे से देर रात्रि तक रहेगा।

गूजेंगी शहनाईयां

अक्षय तृतीया पर तो शहर में शहनाइयां गूंजेगी ही, उसके बाद जून के महीने में भी शादी की धूम रहेगी। अक्षय तृतीया पर शहर में कई जोड़े विवाह के। इस बार मई महीने में विवाह के लिए 14 मुहूर्त हैं। गुरूवार 2 मई के बाद से इसी महीने में 6, 7, 8, 12, 14, 15, 17, 19, 21, 23, 28, 29 और 30 को विवाह के लिए शुभ मुहूर्त पड़ रहा है। वह जून माह में 8, 9, 10, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19, 25 व 26 और जुलाई माह में 6 व 7 दो लग्न हैं।

कहीं बंटती है सगुन, कहीं गुड्डे-गुड्डियों की शादी

यूपी के बुन्देलखण्ड में इसे मनाने का तरीका बिल्कुल अनोखा व अद्भूत है। अक्षय तृतीया से पूर्णिमा तक इसे उत्सव के रूप में मनाते है, जिसे सतन्जा कहा जाता है। इस दिन से कुमारी कन्याएं अपने भाई, पिता, बाबा तथा गांव-घर के लोगों को सगुन बांटती है और झूम-झूम कर गीत गाती है। जबकि बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया पर कुंवारी कन्याएं अपने भाई, पिता तथा गांव में मौजूद घर और कुटुंब के लोगों को शगुन बांटती हैं और भक्तिमय लोकगीत गाती हैं। इस दिन मध्य प्रदेश व पंजाब में लड़कियां सात तरह के अनाजों से देवी पार्वती की पूजा कर सुयोग्य पति की कामना करती है तो मालवा- उज्जैन में नए घड़े के ऊपर खरबूजा और आम्रपल्लव रखकर लोग अपने कुल देवता या इष्टदेव का पूजन करते हैं। राजस्थान में अक्षय तृतीया के दिन वर्षा ज्ञान के लिए शकुन निकाला जाता है तथा अछी वर्षा के लिए लड़कियां शकुन गीत गाती है।

परंपरागत तरीके से होता है विवाह

छत्तीसगढ़ में इसे ‘अक्ती के नाम से जाना जाता है। गांव-गांव में अक्ती पर शादियां होती हैं। अक्ती के दिन शादी करने की इतनी अधिक मान्यता है कि जिस घर में किसी युवक-युवती का ब्याह नहीं हो रहा तो भी उस घर के बच्चे अपने गुड्डा-गुडिय़ा का ब्याह रचाते हैं और विवाह की खुशियां मनाई जाती है। हालांकि इसे लेकर यहां के कई जिलों में भ्रांतियां भी घर कर गयी और पुतरा-पुतरी के विवाह की परंपरा निभाते हुए लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों के भी विवाह काराने लगे, जो अब प्रशासन के लिए खत्म कराना चुनौती बन गया है। काफी हद तक पुतरा-पुतरी के विवाह पर काबू भी पा लिया गया है। और गुड्डे-गुडिय़ों के विवाह कर परपंरा का निवर्हन किया जा रहा है। परंपरागत रुप से बनने वाले पुतरा-पुतरी में बांस और मिट्टी का इस्तेमाल होता है।

परंपरागत परिधान से हटकर शूट-बूट और घाघरा-चोली में सजे गुड्डे-गुडिय़ों की विवाह कराया जाता है। इसके लिए बाकायदा विवाह के मंडप सजाये जाते है। पास-पड़ोस के लोगों को आमंत्रित करते है। गुड्डा पक्ष द्वारा गुड्डी पक्ष वालों के घर बारात ले जायी जाती है। इससे पूर्व तेल, हल्दी की परंपरा भी वास्तविक विवाह की तरह पूरी की जाती है। गुड्डे की बारात के साथ आये लोगों को विधिवत सम्मान देने के साथ नाश्ता आदि परोसा जाता है। इसमें चुकिया, कलशी, मौर, आल्ता आदि का भी प्रयोग किया जाता है। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि उनके समय में बांस और मिट्टी से निर्मित पुतरा-पुतरी का चलन था। अब भी यह देखने को मिलता है, लेकिन आधुनिकता इस पर भी हावी हो गई है।

इससे इतर छत्तीसगढ़ में इस दिन को कृषि के नववर्ष के रुप में भी मनाया जाता है। इस दिन गांव के सभी किसान अपने-अपने घरों से धान लेकर एक जगह एकत्रित होते हैं। फिर उसे कोई एक सिद्घ व्यक्ति, जिसे बैगा कहा जाता है, साथ मिलाकर उसे मंत्रों से अभिमंत्रित करता है। फिर उसे सभी ग्रामवासियों में वितरित कर दिया जाता है। गांव वाले इसी धान को लेकर अपने-अपने खेतों में जाते हैं और उसकी बुवाई करते हैं। जिन गांवों में बैगा के द्वारा अभिमंत्रित नहीं किया जाता उन गांवों में किसान बोआई के लिए संग्रहित धान को एक टोकरी में लेकर जाता है और अपने कुल देवता सहित अन्य ग्राम्य देवताओं में चढ़ाकर बाकी धान की रोपाई अपने खेत में कर देता है।

जैन धर्म में तपस्वियों के लिये विशेष दिन

‘अक्षय तृतीया का पर्व जैन धर्मावलंबियों के लिए खासा महत्व रखता है। कहते हैं इस दिन ही जैन तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या के बाद पारायण किया था। और गन्ने के रस का पान किया था। वे जैन धर्म के ऐसे प्रथम तपस्वी थे, जिन्होंने सत्य और अहिंसा का प्रसार करने के उद्देश्य से पारिवारिक प्रेम और स्नेह का त्याग करते हुए जैन वैराग्य को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। जैन धर्म को मानने वाले इस दिन इक्षु तृतीया के नाम से भी संबोधित करते है। बता दें गन्ने को ही इक्षु नाम दिया गया है। कहते है वर्षीतप के पूर्ण हो जाने पर जैन तीर्थ श्री शत्रुंजय पर जाकर ‘अक्षय तृतीया के दिन उपवास तोड़ा जाता है। यदि वर्षीतप करने वाली कोई महिला हुई तो उसे उसके भाई द्वारा पारायण कराया जाता है। जिसे पारणा नाम दिया गया है। पारणा के साथ तपस्वी को उनके पारिवारिक सदस्य, ईष्ट मित्र आदि भेंट प्रदान करते है।

इस दिन सारे तपस्वी जो शत्रुंजय पर एकत्रित होते है। उनकी भव्य शोभायात्रा समारोह पूर्वक निकाली जाती है। सभी तपस्वियों को उपहार प्रदान किये जाते है। जिसे प्रभावना कहा जाता है। अक्षय तृतीया का पर्व भगवान परशुराम के जन्म से भी जुड़ा हुआ है। भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाने वाले परशुराम इस पृथ्वी लोक में के आदिदेव माने जाते है। भगवान परशुराम थे तो ब्राम, किंतु उनका पराक्रम क्षत्रियों जैसा था। परशुराम रामायण काल के मुनि थे। उनके पिता जमदग्नि ने पुत्रेष्ठि यज्ञ संपन्न कर उन्हें वरदान के रूप में पाया था। जनदग्नि जी की पत्नि रेणुका के गर्भ से परशुराम जी ने ‘अक्षय तृतीया के दिन जन्म लिया। उन्हें भगवान विष्णु का आवेशावतार अर्थात गुस्सैल स्वभाव वाला अवतार माना जाता है। भगवान परशुराम शस्त्र विद्या के महान गुरू थे।

उन्होंने भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण को शस्त्र विद्या सिखायी थी। हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि भगवान परशुराम के शेष कार्यों में अभी उनका एक अवतार होना बाकि है, जो कलयुग की समाप्ति पर कल्कि अवतार के रूप में भगवान विष्णु के दसवें अवतार को शस्त्र विद्या प्रदान करेंगे। भगवान परशुराम महान मातृ-पितृ भक्त थे। श्रीमद्भागवत में उल्लेख मिलता है कि एक बार गंधर्व राज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख उनकी माता रेणुका उन पर आसक्त हो गई और हवन काल का समय बीत जाने पर जनदग्नि अपनी पत्नि अथवा रेणुका के मर्यादा विरोधी आचरण के कारण अपने पुत्रों को माता का वध करने की आज्ञा दे डाली।

परशुराम जी के अन्य भाईयों ने ऐसा करने का साहस नहीं दिखाया और पिता के आज्ञा की अवहेलना की। परशुराम जी ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुये अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दिया और पिता के चरणों में लाकर रख दिया। इस पर जनदग्नि जी ने परशुराम जी से इच्छित वरदान मांगने कहा। यहां पर परशुराम जी का मातृ और पितृ प्रेम सबके सामने आया, उन्होंने पिता की आज्ञा न माने जाने पर मां और भाईयों के वध के बाद अपने पिता से मांगे वर में सभी का जीवन तो मांगा ही साथ ही यह भी वर मांग लिया कि मां सहित सभी भाई वध की बातों को भी हमेशा के लिये भुल जाये।

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