जनजातिय समुदाय के लोग Naturopathy में जड़ी-बूटियों को तोड़कर, पीसकर उसका उपयोग अपने स्वास्थ्य के लिए करते हैं। अब यह चलन शहर की ओर भी बढ़ने लगा है और कई तरह की जड़ी-बूटियों का उपयोग शहरी लोग भी करने लगे हैं। चूंकि जड़ी-बूटिंयों का स्वाद खाने में अजीब लगता है, इसलिए शहरों में इसे पीसकर इसका रस निकाला जाने लगा है। जो आसानी से मरीज के शरीर में पहुंचकर अपना असर दिखाता है। इसी को शहरी भाषा में रसाहार प्राकृतिक चिकित्सा यानि Naturopathy कहा जाने लगा है।
Naturopathy में रोगी को केवल आहार सम्बन्धी नियमों को दृढ़ता से पालन करते हुए कुछ भिन्न-भिन्न स्वाद वाले रस पीने पड़ते हैं।
सुबह का रसाहार करने की प्रक्रिया रोगी कस कर थाम ले तो उसके दिन आसान होते जाएंगे।
भारत में अभी जो प्राकृतिक चिकित्सा चलन में है, वह जर्मनी से आई है जबकि भारत में यदि एक लाख वनौषधियां हैं, तो जर्मनी में मुश्किल से एक हजार होंगी। फिर जर्मनी के प्राकृतिक चिकित्सक उन वनौषधियों के प्राकृतिक उपयोग हमें कैसे सिखा सकते हैं।
कुछ औषधीय रस ऐसे होते हैं, जो बारहों महीने उपयोग में लाए जा सकते हैं
सामान्यतः जो पेड़-पौधे जिस मौसम में आसानी से उपलब्ध होते हैं, उसी मौसम में मानव शरीर को उसकी आवश्यकता भी होती है। जैसे आंवला अष्टमी आते ही इसका उपयोग शुरू हो जाता है। जब तक ताजे आंवले मिलते रहें, तब तक उसका उपयोग करें, फिर आंवले के चूर्ण का उपयोग करें। छट पूजा के बाद कच्ची हल्दी का उपयोग होता है। उसे वसन्त पंचमी या अधिक-से-अधिक होली तक उपयोग में ला सकते हैं। भुई आंवला वर्षा ऋतु में अधिक आता है और उसी समय लिवर सम्बन्धी रोग भी अधिक होते हैं। कुछ औषधीय रस ऐसे होते हैं, जो बारहों महीने उपयोग में लाए जा सकते हैं। जैसे ग्वारपाठा, गेंहू के जवारे, नारियल पानी इत्यादि।
पत्तियों का उपयोग कितनी मात्रा में हो?
आवश्यकतानुसार 5 से 50 पत्तियां। उदारहण के लिए पोदीना, तुलसी, कड़वी नीम, मीठी नीम आदि की 25 से 50 पत्तियां लेते हैं, क्योंकि ये छोटी होती हैं। पीपल, अडूसा जैसे बड़े पत्ते 5 से 10 लिए जाते हैं। भुई व आंवले के पौधे जड़ समेत उखाड़ कर 5 से 10 पौधे लेना चाहिए। गेंहू के जवारे 100 ग्राम एक जन की एक दिन की मात्रा होती है। आंवले 4 या 5 लेने पर 50 मि.ली. रस बन जाता है। हल्दी का रस 25 मि.ली., अदरक या लहसून का रस 2 चम्मच, गिलोए का तना 8 से 9 इंच लम्बा और ग्वारपाठे की पत्तियां छीलकर अंदर का गुदा हाफ कप 50 मि.ली. के बराबर होता है।
पत्तियों को उपयोग में लाने का क्या तरीका है?
पत्तियों को उपयोग में लाने से पहले उसे 2-3 पानी से अच्छी तरह धो लें। पूरा पानी निथारने के बाद आदर्श तरीका तो यह है कि सिलबट्टे पर पत्तियां पीसकर आवश्यकतानुसार पानी डालकर छान कर उसका रस निकाल लें। लेकिन आजकल मिक्सरों से रस निकाला जाता है।
रस बनाने के लिए उपयोग में लाया जाने वाला पानी कैसा हो?
रस बनाने के लिए हमेशा उबला हुआ पानी उपयोग में लाएं। यदि एक रात पहले पानी उबाल कर साफ धुले तांबे के बर्तन में रखकर उसे रात भर चुम्बकित कर लें तो और भी अच्छा होगा।
कौन सा समय रसाहार के लिए अच्छा है?
रसाहर का सबसे अच्छा समय सुबह 6 बजे से 9 बजे के बीच का है। शरीर उसी समय स्वाभाविक रूप से मल का त्याग करता है। उसी समय शरीर में पोषक रस भी पहुंचाए जाने चाहिए। इससे पाचन भी सरलता से होते हैं और क्षारीय होने के कारण ये रक्त की पीएच सही बनाए रखते हैं।
रसाहार के पहले और बाद में खान-पान के क्या नियम हैं?
रसाहार के पहले एकदम खाली पेट रहना चाहिए। सुबह पानी में नींबू निचोड़ कर ले सकते हैं। चाय के बिना न रह सकें तो काली चाय पी सकते हैं। रसों के पाचन का समय आधा या 2 घंटे का होता है। सभी फलों और पत्तियों के रस आधे घंटे में पच जाते हैं, जबकि सब्जियों के रसों को पचने में 2 घंटे का समय लगता है। प्रत्येक रस के पीने के बाद उनके पाचन का समय उन्हें अवश्य मिलना चाहिए, तभी उनके पूरे लाभ लिए जा सकते हैं।
क्या रसाहार शुरू करने के बाद दूसरे औषधियों का उपयोग छोड़ दें?
रसाहार शुरू करने के बाद सभी विटामिन की गोलियां लेनी बन्द कर देना चाहिए। दर्द निवारक और तीव्र रोगों को दबाने वाली औषधियां अत्यावश्यक हो तो ही लें। जीर्ण रोगों से संबंधित औषधियां जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, थायरायड अथवा अन्य अंतःस्त्रावी ग्रन्थियों के रोगों संबंधी औषधियां यथावत लेते रहें।
रस का स्वाद ठीक न लगे तो उसमें क्या मिलाना चाहिए?
रस को पीने योग्य बनाने के लिए उसमें आंवला, नींबू, काली मिर्च, शहद मिला सकते हैं। नमक या कोई अन्य मसालों का उपयोग अथवा दूध व दही आदि उसमें न मिलाएं।
रस बनाने के बाद कितनी देर तक उसका उपयोग उचित होगा?
किसी भी रस को बनाए जाने के दो घंटे के भीतर उन्हें पी लेना चाहिए, क्योंकि बाद में उनके गुण कम हो जाते हैं। फल अथवा गेहूं के जवारे के रस के तो 6 घंटे बाद ही खराब होने की संभावना रहती है। अन्य रस भी 24 घंटे बाद खराब हो सकते हैं। गिलोए, ग्वारपाठा, आंवला, तुलसी आदि कुछ रस 24 घंटे फ्रिज में रखे जा सकते हैं।
रसाहार का नियमित उपयोग कब नहीं करना चाहिए?
शरीर की अत्यंत जीर्ण अवस्था में रोगी को एकदम से पूरी की पूरी मात्रा का रस नहीं देना चाहिए। प्रतिदिन आधी मात्रा से धीरे-धीरे रोगी को रस देना शुरू कर सकते हैं। 10 दिनों बाद आवश्यकतानुसार रसो की संख्या बढ़ाई जा सकती है। छोटे बच्चों के साथ भी यही नियम है।
रसाहार के लाभ कितने दिनों में दिखाई देने लगते हैं?
शरीर क्रिया विज्ञान के अनुसार मानव शरीर में नई लाल रक्त कणिकाएं बनने में चार महीने का समय लगता है। आयुर्वेद में भी औषधीय प्रभावों के 40 दिन, 4 माह या सवा साल में दिखाई देने के उदाहरण मिलते हैं। मेरा अनुभव भी यही कहता है कि रसाहार प्रारंभ करते ही 8-10 दिनों में पाचन तंत्र में परिवर्तन अनुभूत होने लगते हैं, लेकिन रोग पर होने वाला वास्तविक प्रभाव 4 माह में ही दिखाई देता है। जीर्ण रोगों के ठीक होने का एक सामान्य नियम है कि रोग जितना पुराना है, ठीक होने में उससे दोगुना समय लगता है।
रसाहार से कौन-कौन से रोगों को ठीक किया जा सकता है?
रोग चाहे कोई भी हो, उनके कारण निश्चित है। हमारी विवेकहीन दिनचर्या, अपने शारीरिक अंगों का आवश्यकता से अधिक या कम उपयोग, वंशानुगत रोग, तनाव, पोषक तत्वों की कमी और इन सब के कारण शरीर में होने वाला विजातीय तत्वों का जमावड़ा। रसाहार से पोषक तत्वों की पूर्ति होती है, वात, पित्त, कफ का संतुलन होता है, शरीर का शोधन होता है, विजातीय तत्व शरीर से निकाल बाहर किए जाते हैं और शरीर निर्मल हो जाता है। इसलिए रसाहार के साथ योग और विवेकपूर्ण दिनचर्या हो तो अंगों की स्थाई विकृति को छोड़कर सभी रोग ठीक किए जा सकते हैं।
यह कैसे जानें कि किस मौसम में कौन सा रस लेना चाहिए ?
रसाहार के रूप में केवल फलों, सब्जियों और गेंहू के जवारे का ही उपयोग प्रचलित है। अन्य सभी वनौषधियों के रसों को आयुर्वेद के अंतर्गत माना गया है। आयुर्वेद (वैदिक काल का) भी मनुष्य को शरीर के विवेकपूर्ण उपयोग का ही परामर्श देता है, जो प्राकृतिक चिकित्सा का आधार है। ऐसी सारी वनौषधियों को रसाहार के अंतर्गत उपयोग में लाना चाहिए, जिनकी पत्तियों के औषधीय उपयोग हैं।
कौन-कौन से रसाहार सामान्यतः लोगों के काम आते हैं ?
गेंहू के जवारे, गिलोए, ग्वारपाठा, शीषम, पीपल, अदरक, कड़वी नीम, मीठी नीम, बेलपत्र, अडूसा, अपामार्ग, गेंदे के फूल या पौधे की पत्तियां, हरसिंगार, पोदीना, पान, अगिया, पर्णबीज, मुलेठी, हल्दी, आंवला, मकोय, सहिजन, मेथी, मूली, पालक, टमाटर, मेंथा, गुड़मार, तुलसी, निर्गुण्डी, अमलतास, हड़जोड़, जामुन आदि।
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