नई दिल्ली। बोफोर्स तोप दलाली मामले में SLP न दायर करने का अजय अग्रवाल का सीबीआई से आग्रह किया हैैै। उच्चतम न्यायालय में अपील दायर करने वाले अधिवक्ता एवं भारतीय जनता पार्टी नेता अजय अग्रवाल ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से इस मामले में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने के बजाय हलफनामा दायर करने का अनुरोध किया है, ताकि मामला और अधिक समय तक न लटके।
श्री अग्रवाल ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को कल देर शाम एक पत्र लिखकर उनसे इस मामले में अलग से एसएलपी (Special Leave Petitions) दायर न करने का अनुरोध किया है।
वर्ष 2014 के आम चुनाव में रायबरेली सीट से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले श्री अग्रवाल ने कहा है कि जांच एजेंसी को बोफोर्स दलाली मामले में 12 वर्ष से लंबित आपराधिक अपील में अपना जवाब दायर करना चाहिए, न कि एसएलपी।
सीबीआई ने मोदी सरकार से सुप्रीम कोर्ट में SLP दायर करने की मंजूरी मांगी थी
गौरतलब है कि दो दिन पहले सीबीआई ने मोदी सरकार से सुप्रीम कोर्ट में SLP दायर करने की मंजूरी मांगी थी।
सीबीआई ने इस मामले में मोदी सरकार को एक लेटर लिखा है और कहा है कि वह 2005 के फैसले पर फिर से विचार करे, साथ ही इस घोटाले में FIR रद्द करने को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में SLP (विशेष अनुमति याचिका) दायर करने की मंजूरी दे।
न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक गवर्नमेंट ऑफिशियल्स ने बताया है कि सीबीआई ने यह लेटर DoPT (डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग) को लिखा है। इसमें जांच एजेंसी ने कहा है कि वह दिल्ली हाईकोर्ट के 31 मई 2005 के उस फैसले को चुनौती देने के लिए SLP दायर करना चाहती है, जिसमें बोफोर्स मामले में यूरोप के हिंदुजा भाइयों के खिलाफ सभी आरोपों को निरस्त करने का आदेश दिया गया था।
गवर्नमेंट ऑफिशियल्स का कहना है कि सीबीआई 2005 में ही विशेष अनुमति याचिका दायर करना चाहती थी लेकिन उस वक्त की यूपीए सरकार ने उसे इसकी मंजूरी नहीं दी।
सीबीआई को देनी पड़ेगी काफी सफाई
हालांकि लीगल एक्सपर्ट्स का मानना है कि सीबीआई को 12 साल से ज्यादा समय तक इस बात को नजरअंदाज करने के लिए काफी सफाई देनी पड़ेगी।
दिल्ली हाइकोर्ट के उस वक्त के जज जस्टिस आर. एस. सोढ़ी ने 31 मई 2005 को हिंदुजा भाइयों (श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाशचंद) और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ सभी आरोप खारिज कर दिए थे और सीबीआई को मामले से निपटने के उसके तरीके पर यह कहते हुए फटकार लगाई थी कि इससे सरकारी खजाने पर करीब 250 करोड़ रुपए का बोझ पड़ा।
हाईकोर्ट ने राजीव गांधी को आरोप मुक्त कर दिया था
2005 के फैसले से पहले दिल्ली हाइकोर्ट के उस वक्त के एक अन्य जज जस्टिस जे. डी. कपूर ने दिवंगत पीएम राजीव गांधी को 4 फरवरी 2004 को आरोप मुक्त कर दिया था और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ आईपीसी के सेक्शन 465 के तहत धोखाधड़ी का आरोप तय करने का निर्देश दिया था।
घोटाले के तथ्यों पर विचार करेगी सीबीआई
18 अक्टूबर को सीबीआई ने कहा था कि वह प्राइवेट जासूस माइकल हर्शमैन के दावों के मुताबिक बोफोर्स घोटाले के तथ्यों और परिस्थितियों (facts and circumstances) पर विचार करेगी। हर्शमैन ने आरोप लगाया है कि राजीव गांधी की अगुआई वाली सरकार ने उसकी जांच में रोड़े अटकाए थे।
हर्शमैन ने क्या किया है दावा?
अमेरिका की प्राइवेट जासूसी कंपनी Fairfax के प्रेसिडेंट हर्शमैन ने हाल ही में टीवी चैनलों को दिए इंटरव्यू में दावा किया था कि राजीव गांधी को जब स्विस बैंक खाते मोंट ब्लैंक के बारे में पता चला था तो वह काफी गुस्से में थे।
प्राइवेट जासूसों के एक कॉन्फ्रेंस को संबोधित करने के लिए पिछले हफ्ते यहां आए हर्शमैन ने यह आरोप भी लगाया था कि बोफोर्स तोप घोटाले में रिश्वत का पैसा स्विस खाते में रखा गया था।
क्या था बोफोर्स घोटाला?
बोफोर्स तोप घोटाले को आजाद भारत के बाद सबसे बड़ा मल्टीनेशनल स्कैम माना जाता है। 1986 में हथियार बनाने वाली स्वीडन की कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को 155mm की 400 तोपें सप्लाई करने का सौदा किया था। यह डील 1.3 अरब डॉलर (डॉलर के मौजूदा रेट से करीब 8380 करोड़ रुपए) की थी। 1987 में यह बात सामने आई थी कि इस डील को हासिल करने के लिए भारत में 64 करोड़ रुपए दलाली दी गई। उस वक्त केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे।
स्वीडिश रेडियो ने सबसे पहले 16 अप्रैल 1987 में दलाली का खुलासा किया। इसे ही बोफोर्स घोटाला या बोफोर्स कांड के नाम से जाना जाता है। इसी घोटाले के चलते 1989 में राजीव गांधी की सरकार गिर गई थी।
दलाली में किसका रोल था?
आरोप था कि राजीव गांधी परिवार के नजदीकी बताए जाने वाले इटली के कारोबारी ओत्तावियो क्वात्रोची ने इस मामले में बिचौलिए की भूमिका अदा की। इसके बदले में उसे दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला। दलाली देने के लिए एक मुखौटा कंपनी ए. ई. सर्विसेस बनाई गई थी। क्वात्रोची की 2013 में मौत हो गई थी।
1997 में इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। जांच पूरी होने में 18 साल लगे, जिस पर 250 करोड़ रुपए खर्च हुए। सीबीआई जांच पर सुनवाई के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने राजीव गांधी को इस मामले में क्लीन चिट दे दी थी।
-एजेंसी
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