जीवन दुविधा का रखवाला, सृष्टि का सब खेला है।।
दूर तलक बैठा तारा भी, अन्धकार का मेला है।।
काम काज सब छोड़ के सारे, रहते नफरत में ऐंठे।।
अरे धूल में तो मिलना ही है, फिर धूल ही फांके क्यों बैठे।।
भूल गए जब नौका ही, तो दरिया पार करें किसमें।।
पुकारे अंतहीन ये सागर, अंत हुआ एक दिन जिसमें।।
ढूंढें ज्ञान किताबों में, दर दर फिरते रहते हम।।
पर परमशक्ति का एक अंश जो मिलता, फिर न होता ग़म।।
हम रहते अज्ञान के वश में, वो बुनते खुशियों की माला।।
पीते वो भी, पीते हम भी, वो मधुरस, तो हम मधुशाला।।
पर निराश न होने दे खुद को, है डगर सत्य की साथ तेरे।।
मुसाफिर बन और कदम बढ़ा, तेरी किस्मत है हाथ तेरे।।
न रोक सके कोई काँटा तुझको, न बाँध सके कोई ज़ंज़ीर।।
न डर, न भय, न अभिलाषा हो, जो भोलेनाथ हों नाथ तेरे।।
-अखिल पाण्डेय व्यास
(कवि, संगीतकार, लेखक, छात्र)


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