हिन्दू आस्था का प्रतीक खण्डहर में तब्दील
शिफा अब्बास
पिहानी,हरदोई-पिहानी कस्बे में बाबा बाग के नाम से प्रचलित तकरीबन 500 साल से अधिक प्राचीन ऐतिहासिक धार्मिक स्थल जो कि नगरीय सीमा के अंदर,मीरसंराए मोहल्ले से तकरीबन आधा किमी उत्तर की ओर व सल्लिया पिहानी मुख्य मार्ग से तकरीबन एक किमी पश्चिम की ओर घने झाड़ और बाग के बीच स्थित है।यूँ तो हिन्दू धर्म की आस्था से जुड़े नगर में अनेकों मंदिर व धार्मिक स्थल हैं मगर बाबा बाग के नाम से जाना जाने वाला मंदिर अपनी अलग ऐतिहासिक परिचर्चा से प्रचलित है।यहाँ के महंत और पुराने लोगों के मुख की बताई गाथा है कि मुगलिया शासन में पिहानी में मंगलगिरी बाबा ने आकर उक्त बाग पर पैर जमा दिए और अपनी पनाहगाह बनाकर धूनी रमा दी थी।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार,उस दौरान बाबा को हटाने के खूब जतन किए गए तो कस्बे में महामारी फैल गई।जब ये बात दरबारे आम से दरबार खास तक पहुँची तो नवाब ने जाकर बाबा की मंशा जानी।बाबा ने अपनी मंशा से एक गोला फेंकने की इच्छा प्रकट करते हुए शर्त रखी कि इसी बाग में बाबा भोलेनाथ के मंदिर का निर्माण होगा और इस बाग से जितनी दूर तक मेरा गोला गिरेगा ,वहां तक बाबा भोलेनाथ मंदिर के बाग की सम्पत्ति का अधिकार होगा।शर्त मंजूर करने के बाद बाबा ने जो गोला फेंका उसमें तकरीबन 20 बीघा जमीन बाबा के अधीन हुई।शर्त के अनुसार, स्थान और भूमि बाबा के नाम से छोड़ दी गई और महामारी खत्म हो गई।तब से आज तक वह जगह और उस पर बना भोलेनाथ का मंदिर बाबा बाग के नाम से प्रचलित है।बाबा के बाद बाबा शिष्य परमहंस बाबा,अद्वेतानन्द बाबा,प्रतिज्ञा नन्द बाबा पीढ़ी दर पीढ़ी सेवा में रहे।अब प्रतिज्ञा नन्द बाबा के बाद यहाँ पर स्थित भोलेनाथ मंदिर के महंत तोतापुरी सन्यासी बाबा जिम्मेदारी सँभाले हैं।जो इस समय पर तकरीबन आधा दर्जन गाए पालकर सादा जीवन व्यतीत कर रहे हैं।मगर आज भी यह जगह नगर विकास की तमाम सुख सुविधाओं से ऐसे वंचित है मानो यह जगह नगरीय सीमा का हिस्सा ही नहीं है।मंदिर तक आने-जाने का तकरीबन 100 मीटर का कच्चा रास्ता है और मंदिर के चारों ओर घनी झाड़ी के बीच जीर्ण-शीर्ण अवस्था में बाबा की झोपड़ी और खण्डहर में तब्दील इमारतें हैं।यहां बाबा मंदिर की देख-रेख में रह रहे महंत तोतापुरी सन्यासी बाबा का कहना है कि शासन सरकारें दुनिया भर की तमाम योजनाएं चला कर बहुत सी सुख सुविधाओं से सबको फलीभूत कर रही हैं मगर बाबा भोलेनाथ मंदिर के जीर्ण-शीर्ण स्थान के जीर्णोद्धार के लिए कोई योजना नहीं है।बाबा के पास रहने के लिए टूटी कुटिया,खान-पान के लिए फूटी लुटिया,रोशनी के लिए माटी को दिया और पानी के लिए एक छोटा सा नल है शौच क्रिया के लिए आज भी खेतों के खुले मैदान में जाना पड़ता है।बाबा की मंशा है कि काश पालिका प्रशासक हमारे मंदिर व स्थान का कभी निरीक्षण करने आते और रहने के लिए कालोनी वशौचालय, प्रकाश व्यवस्था के लिए सौर उर्जा और पेयजल आपूर्ति की उचित व्यवस्था में एक नल मुहैया करा देते तो सूनसान स्थान पर बाबा भोलेनाथ के अंधियारे मंदिर में भी उजियारा हो जाता।यहाँ भक्त तो बहुत आते हैं। लोगों की मानता मुरादें भी खूब आती हैं मगर न तो साहेब आते हैं और न ही उनकी योजनाएं आती हैं जिन्हें बाबा के मंदिर में योगदान समझा जा सके।यहाँ बाबा मंगल गिरी का प्रसिद्ध तालाब भी आस्था का एक ऐसा प्रतीक है जो कुष्ठ निवारण तालाब के नाम से प्रचलित है।आस्था से जुड़े लोग मानते हैं कि यहाँ बाबा के तालाब में सच्चे मन से कुष्ठ रोगी के स्नान करने से निरोग हो जाते हैं।बाबा मंगल गिरी का ये प्राचीन स्थान नगर पालिका परिषद की सीमा का हिस्सा है इसलिए मूलभूत सुविधाएँ मुहैया कराना पालिका प्रशासक की जिम्मेदारी है।

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