
लखनऊ। गर्मियों में अस्थमा के मामलों में थोड़ी कमी आ जाती है, इसलिये कईं लोग थोडे से आसवाधान हो जाते हैं, अपनी दवाईयां समय पर नहीं लेते और जरूरी सावधानी नहीं रखते। लेकिन ऐसा नहीं है कि गर्मियों में अस्थमा के ट्रिगर वातावरण में उपस्थित नहीं रहते बल्कि कुछ ट्रिगरों जैसे वायु प्रदूषण, पराग कण, धूल आदि की उपस्थति अन्य मौसमों की तुलना में बढ़ जाती है। गर्मी और उमस भी अस्थमा के ट्रिगर का कार्य करती है, इसलिये जरूरी है कि इस मौसम में भी पूरी सावधानी रखी जाये ताकि अस्थमा अटैक का खतरा नहीं रहे।
नई दिल्ली स्थित सरोज सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के रेस्परेटेरी मेडिसीन के डॉ. अनंत गुप्ता का कहना है कि अस्थमा श्वसन मार्ग से संबंधित एक रोग है। इससे पीडित व्याक्ति के लिये सांस लेना कठिन हो जाता है क्योंकि जो नलिकाएं फेफडों तक ऑक्सीजन ले जाती है वह फूल जाती हैं। सांस की नलियां वायु में अस्थमा के ट्रिगर (एक एलर्जन) के संपर्क में आने के कारण फूल जाती हैं। अस्थमा का कोई स्थायी इलाज नहीं है, जिससे इसे जड़ से समाप्त किया जा सके। डॉक्टर की सलाह से नियमित दवाओं का सेवन और इसके ट्रिगर (कारकों) से बचने के लिए जरूरी उपाय अपनाकर इसे नियंत्रित रखा जा सकता है। अस्थमा तब तक ही नियंत्रण में रहता है, जब तक रोगी आवश्यक सावधानियां बरत रहा है।
डॉ. अनंत गुप्ता का कहना है कि अस्थमा के कई कारक है जैसे कि पर्यावरण प्रदूषण, अनुवांशिक कारण, एलर्जी, ठंडी हवाएं, मानसिक तनाव आदि। कईं अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि गर्म और उमस भरी हवा में सांस लेने के चार मिनिट में ही अस्थमा के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। अस्थमा के लक्षण व्यक्ति विशेष के अनुसार बदल सकते हैं। वैसे सामान्य रूप से अस्थमा के निम्न लक्षण दिखाई देते है छाती में जकडन, रात में और सुबह कफ की शिकायत होना, श्वास नली में हवा का प्रवाह निर्बाध रूप से न होना, सांस लेने में कठिनाई या सांस उखडना, सांस लेते हुए घरघर की आवाज करना, खांसी आदि।

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