सबसे अधिक वोटरों वाले लखनऊ सीट पर चुनावी मैदान में हैं 15 प्रत्याशी
सुबह सात बजे से शुरू हो जाएगा राजनाथ की परीक्षा, आचार्य के संघर्ष और पूनम की चुनौती का काउंट डाउन
रवि गुप्ता
लखनऊ। भारतीय राजनीति के अजातशत्रु कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के गढ़ लखनऊ में चौथे चरण के तहत सोमवार को मतदान होंगे। वोटर अपने तर्क-वितर्क, समझ-संयम, पसंद व नापसंद की कसौटी पर कसते हुए अपने-अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे। इस बार के लोकसभा चुनाव में राजधानी की सीट पर कुल 15 प्रत्याशी मैदान में हैं, हालांकि चुनाव के केंद्रबिंदु में राजनाथ सिंह, आचार्य प्रमोद कृष्णम और पूनम सिन्हा ही प्रमुख माने जा रहे हैं।
हालांकि राजनीतिक जानकारों की मानें तो अभी भी लखनऊ वासी यहां से रिकॉर्ड समय तक सांसद रहे दिवंगत अटल बिहारी से अपने संवेदनशील जुड़ाव को नहीं भुला पाये हैं, ऐसे में यहां के चुनावी समर में प्रत्याशी चाहे किसी भी दल का हो पलड़ा भारी तो अटल के राजनीतिक अनुयायी या प्रतिनिधि का ही होता है।
राजनाथ सिंह को इसका लाभ तो मिलेगा मगर मौजूदा सांसद होने के नाते उन्हें सत्ता विरोधी लहर का भी सामना करना पड़ सकता है। इतना ही नहीं राजनाथ के राजनीतिक कैरियर को लेकर यह भी सवाल उठता है कि वो एक बार जहां से चुनाव लड़ते हैं तो जीतने के साथ दूसरी बार वहां से हट जाते हैं…मगर इस बार राजनीतिक मायने व हालिया समीकरण बदले हुए हैं, ऐसे में राजनाथ पर यह भी प्रेशर होगा कि वो अपनी इस ‘पॉलीटिकल वॉक ओवर’ से किसी न किसी तरह बाहर आयें।
वहीं बतौर कांग्रेस उम्मीदवार लखनऊ के चुनावी दंगल में आचार्य प्रमोद का उतरना उनके लिए भले ही मायने रखता हो, मगर उनके इस राजनीतिक संघर्ष में उनके ही दल को संभवत: रुचि नहीं है। आचार्य शुरू से ही लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब का उदाहरण देते हुए लगातार मुस्लिम वर्ग के लोगों को आकर्षित करने में तो लगे रहें, लेकिन चुनाव से ठीक पहले जब शिया धर्म गुरू मौलाना कल्बे जव्वाद ने राजनाथ से अपने व्यक्तिगत रिश्ते का हवाला देते हुए उनके समर्थन को जगजाहिर किया तो उनकी सारी कोशिशों पर पानी फिर गया। जबकि प्रदेश कांग्रेस खेमे में मुस्लिम संप्रदाय से जुडेÞ कई दिग्गज लीडरों की लम्बी फेहिरस्त है। यहां से सपा-बसपा गठबंधन प्रत्याशी पूनम सिन्हा की स्थितियों पर गौर करें तो उन्हें लखनऊ की राजनीतिक आबोहवा समझने के लिए अभी काफी मेहनत करनी पड़ेगी। तमाम शहर वासी तो यह भी कहते फिर रहें कि पति शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा छोड़ कांग्रेस में आ गए और खुद पत्नी पूनम सिन्हा का अचानक सपा में इंट्री होना और फिर दोनों की कर्मस्थली मायानगरी मुंबई, एक पटना साहिब से तो दूसरा लखनऊ से उम्मीदवार…ये तो यही दर्शाता है कि जब व्यवहारिक जीवन में इनके बीच इस कदर ऊथल-पुथल है तो फिर सैद्धांतिक राजनीति के क्षेत्र में इनको लेकर कैसे भरोसा किया जा सकता है।

No comments:
Post a Comment