बनारस में बहुत कुछ सुधरा, काफी कुछ बदला मगर जमीनी बदलाव अभी भी अपेक्षित
पर्यटन, स्वच्छता, बिजली, सड़क के क्षेत्र में हुआ काम
मेडिकल, शिक्षा, रोजगार अभी भी समस्या
रवि गुप्ता
तरुणमित्र। मोक्षदायिनी नगरी, बाबा विश्वनाथ की नगरी, विश्व की सांस्कृतिक धरोहर को समेटे रखने वाली नगरी, बनारसी साड़ियों का शहर, घाटों का शहर, गलियों का नगर या आम बोलचाल की भाषा में कहें तो अमन व भाई चारे का शहर…कुछ समय पहले तक कुछ इन्हीं चिर-परिचित, पुरातन व प्राचीन और किताबी नामों से वाराणसी शहर जाना जाता रहा। लेकिन पांच बरस पहले वाराणसी जिसे काशी और बनारस भी कहा जाता है, यकायक देश-प्रदेश की राजनीति का केंद्रबिंदु बन गया। वजह साफ है, यहां के जनप्रतिनिधित्व की कमान स्वयं देश की पूर्ण बहुमत वाली सरकार के मुखिया यानी प्रधानमंत्री के हाथों में रही। ऐसे में बतौर सांसद मोदी के अलावा उनके पूरे मंत्रिमंडल से लेकर योगी सरकार व शासन-प्रशासन के फोकस में भी बनारस पूरे पांच सालों तक रहा।
अब पांच बरस बीत गए…बनारस में बहुत कुछ सुधरा, काफी कुछ बदला मगर कुछ जमीनी बदलाव अभी भी अपेक्षित हैं।
बनारस से कई हजार किमी दूर स्थित गुजरात राज्य के प्रभावशाली सीएम रहें नरेंद्र दामोदार दास मोदी ने जब राष्ट्रीय राजनीति में कदम बढ़ाया तो पूर्वांचल की इस धरती को चुना। चुनाव हुए और नतीजे आये तो देखा कि बनारस के लोगों ने भी मोदी को रिकॉर्ड मतों से जीताकर सदन में अपने क्षेत्र की राजनीतिक रहनुमाई के लिए चुना। पीएम मोदी के यहां से सांसद होने का काफी व्यापक लाभ काशी वासियों को मिलता दिखा। इन पांच सालों में बनारस के अंदर हुए विकास के अहम पहलुओं पर गौर किया जाये तो पर्यटन व स्वच्छता दो ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें काफी तरक्की हुई है। शहर को विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों से जोड़ने वाले चारों तरफ फ्लाई ओवर भी बने और बनाये जा रहे हैं।
मगर जब बात शहर को टैÑफिक जाम व अतिक्रमण समस्या से निजात दिलाने और यहां बडेÞ उद्योग-धंधे लगाने, शिक्षा व मेडिकल के स्तर में आमूल-चूल सुधार करने की आती है तो यही लगता है कि अभी बहुत करना बाकी है। वहीं बिजली व्यवस्था की बात करें तो भले ही यह प्रदेश सरकार के तहत आता हो, मगर केंद्र व राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने और ऊपर से पीएम का संसदीय क्षेत्र होने के नाते वाराणसी को अब जाकर भरपूर बिजली मिलने लगी है। इसका सबसे अधिक लाभ यहां पर बनारसी साड़ियों के कारीगरों को मिला। लोहता शहर के एक तरफ बसा यह ऐसा इलाका है जहां पर बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी है और सभी घरों में बनारसी व अन्य कढ़ाई वाली साड़ियों की कताई-बुनाई के लिए छोटी-मझोली यूनिटें लगी हैं। यहीं के एक कारीगर कलीम भाई के मुताबिक बिजली की स्थिति बदतर थी, ऐसे में काम कराने के लिए जेनरेटर व अन्य साधनों पर निर्भर रहना पड़ता था जिससे साड़ियों पर लागत बढ़ जाती थी और पूरा व सही दाम नहीं मिल पाता था। मगर अब बिजली सप्लाई से वो काफी संतुष्ट हैं और कहने से नहीं जरा भी नहीं हिचकिचाते कि पीएम का क्षेत्र होने का फायदा तो मिला।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि वाराणसी शहर का जो पर्यटन एक तरह से सुप्तावस्था में चला गया था, वो मोदी की अगुवाई होने के बाद जाग्रत सा हो गया। मोदी जब एशिया के विकसित देशों में शुमार दक्षिण कोरिया व जापान के शीर्ष प्रतिनिधिमंडल के साथ वाराणसी घाट पर गंगा आरती व पूजन-अर्चन में शामिल हुए तो राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय जगत की भी निगाहें काशी के सांस्कृतिक धरोहरों की ओर आकृष्ट होने लगीं। शहर के मैदागिन चौराहे के आसपास काफी समय से फुटकर सामानों की दुकान लगा रहें राजेश कुमार की मानें तो पहले की तुलना में अब काफी संख्या में जापान व कोरिया के पर्यटकों का समूह यहां आता रहता है। हालांकि दूसरी तरफ मेडिकल व शिक्षा के बिंदुओं पर बीएचयू से पठन-पाठन करके निकले और वर्तमान में मध्य प्रदेश के न्यायिक सेवा में कार्यरत आनंद कमलापुरी का कहना है कि इन दोनों सेक्टरों में अभी भी काफी सुधार की गुंजाइश है।
शहर में पांच सेंट्रल यूनिवर्सिटी हैं जिसमें काशी हिन्दू विवि (बीएचयू), काशी विद्यापीठ, संपूर्णानंद संस्कृत विवि सहित बौद्ध अनुयायियों का भी विवि है। मगर बीते पांच सालों में शहर के इन पांच शैक्षिक अध्ययन, अनुसंधान व शोध संस्थानों के लिए क्या किया गया तो यही निकलेगा कि बीएचयू सहित अन्य यूनिवर्सिटिज में कुछ विषयों की सीटें बढ़ा दी गर्इं, कुछ अनुदान जारी किया गया…वगैरह, वगैरह। तो क्या पूरे एशिया में कभी छाये रहे शिक्षा के इन प्रमुख केंद्र स्थलों को केवल ऐसे भौतिक विकास की ही जरूरत है। मेडिकल की बात करें तो अकेले बीएचयू कैम्पस पर ही वाराणसी और आसपास के कई जिलों के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, नेपाल आदि से आने वाले मरीजों का भार रहता है।
वहीं बनारस में व्यापार की स्थितियों पर गौर करें तो काफी समय से यह पूर्वांचल का औद्योगिक केंद्रबिंदु रहा। रामनगर इंडस्ट्रियल एरिया में तमाम छोटी-बड़ी इकाईयां जैसे-तैसे करके चल रही हैं। शहर के सिगरा इलाके के साड़ी दुकानदार पंकज कुमार का कहना है कि उनके दादा-दादी विभाजन के बाद पाकिस्तान से यहां आकर बसे थे। उन्होंने बताया कि पहले दादा, फिर पापा और अब वो कारोबार संभाल रहे हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि मोदी के आने से बनारस में विकास तो दिख रहा, पर जीएसटी की त्रासदी से अभी तक वो और उन जैसे छोटे-मझोले व्यापारी अभी तक नीं ऊबर पाये हैं। पीएम मोदी की अगुवाई और रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा का वाराणसी से सटे क्षेत्र गाजीपुर से सांसद होने का पूरा फायदा बनारस को रेल सुविधाओं के तौर पर मिला। वाराणसी कैंट सहित शहर के अन्य रेलवे स्टेशनों का विकास हुआ, कई सुपरफास्ट टेÑनें बढ़ार्इं, यात्री सुविधाओं बढ़ीं…मगर इसका लाभ आसपास के जनपदों को कहां तक मिला यह सोचने वाली बात है।
गंगा को जिसकी दरकार…
बनारस की बात चले और गंगा का जिक्र न हो तो बेमानी होगा…काशी वासियों के जेहन में अभी भी पांच साल पहले मोदी के वो बोल याद हैं…मुझे किसी ने नहीं बुलाया है और न ही मैं किसी के कहने पर यहां आया हूं, मुझे तो गंगा मैया ने यहां बुलाया है। आज यहां पर गंगा की यही तस्वीर दिखती है कि घाट तो साफ-सुथरे रहते हैं, लोगों में गंगा को स्वच्छ रखने की ललक व जागरुकता भी बढ़ी है, मगर गंगा में विभिन्न श्रोतों से गिरने वाले औद्योगिक कचरे पर आज तक अंकुश नहीं लगाया जा सका है। शायद जिस सबसे पहले गंगा को सबसे अधिक दरकरार इसी चीज की है कि इससे नर्क से उसे कब और कैसे छुटकारा मिल पायेगा। मोदी सरकार के यहां से निकलने वाले जल मार्ग को देखें तो प्रयागराज-वाराणसी-हल्दिया (बंगाल) तक ‘नेशनल वॉटर वे’ का खाका तो खींचा गया…मगर दशकों से नाव चलाने वाले उन मांझियों, नाविकों और मृत शरीर को अग्नि व पावन जल से तृप्त करने वाले डोम समुदाय को लेकर अभी तक क्या विकास किया गया जिनके लिए भरण-पोषण का एकमात्र साधन जीवनदायिनी गंगा ही है।

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